......विवेक के जाने के बाद मै भी ऑफिस के लिए निकल पड़ी ..धुप लुकाछिपी का खेल खेल रही थी फिर से बारिश होने लगी ...घर से ऑफिस बहुत दूर था . ख्याल फिर से मेरा पीछा करने लगा मौसम बहुत प्यारा हों गया था बारिश तो मुझे बहुत प्यारी लगती है मौसम मुझे पागल बना रहा था उस पर तुम्हारे यादे.....ऑफिस जाने का मन नहीं हों रहा था ड्राईवर को वापस भेज दिया खुद ही ड्राइव करने का मन हों चला था . उन पलों को जो सहेजना था जो तुम्हारे साथ बिताये थे ....यही वो पल है जिनके सहारे मै जी रही हू यही तो जीने के एनर्जी दिए रहते है . पहाड़ी रास्तो पर गाडी चलाना खतरों से खाली नही होता पर खतरों से डर कब लगता है .
कई बार लोगो ने मेरी आजादी को कैद करने के कोशिश की पर कामयाब न हों पाए जब कैद होना चाहा था तो ऐसा तूफान आया की मेरे अस्तिव के
चिंदे चिंदे ही उड़ गए . तब से यह अपने साथ ऐसा भवर साथ लिए चलती है की कोई आ रहा है या नहीं वह नहीं देखना चाहती है .
.....बारिश की बूंदों ने मझे सरोबार कर दिया कैसी सिहरन से होती है मन तड़पता है मै और भी पागल होती जाती हू .तुम क्यों दूर चले गए प्रशांत !
इन रास्तो में अब भी अतीत को खोजती हू न जीती हू न मरती हू ...सपना कितना अजीब था जो रात को देखा था वह अब भी मेरे साथ है लगा खुली आँखों से एक खवाब देख रही हू .मन सिसकता है तब सिर्फ तुम याद आते हों जो दुनिया समझती है सच नहीं है क्या मै तनहा हू नहीं मेरे साथ तुम्हारी याद जो है इन्ही के सहारे चलना है कितनी दूर तक पता नहीं ....!
कागज पर कुछ लकीरों को बनाया बिगाड़ा वही मेरी तक़दीर बन गयी इन आड़ी तिरछी ,काली सफ़ेद लकीरो के माया जाल में ही उलझी हू अभी तक निकल नहीं पाई .गाड़ी चलाते चलाते थकान होने लगी खयालो से बाते करते करते कितनी दूर आ गयी .थोड़ी देर रुकने का मन हुआ ....हा यही तो हम बात किया करते थे घाटी बहुत दूर रह गयी ठंडी हवा चल रही थी ...कर सड़क के किनारे पार्क कर ...पहाड़ी से नीचे देखा
खाई देख सिहरन होने लगी ...यह सुंदर जगह तुमने ही दिखाइ थी ओह माय गॉड...इट्स बयूतिफुल ....और तुम लगभग गिरते गिरते बचे थे तुम्हारी शरारते कभी ख़त्म न होने का नाम ही नहीं लेती थी .............to be continue...next part very soon .
(pictures frm google)
जिन्दगी के उतार चढाव में झांकने की एक कोशिश का नाम है जीवन धारा। बह रहे है इस धार में या मंझधार में कौन जाने?
Thursday, June 6, 2013
Wednesday, June 5, 2013
तुम मेरे हों ..........!....part 1
................
मन करता है आँखों में एक संसार बसा ले हाथो में हाथ ले ,पतझड़ के मौसम में इन संकरी रहो में हम साथ साथ गुजर जाये . मुझ तक जो पहुचती है इन मासूम आवाजो को में कैसे साज दू . घुटन भरी यादो से में कैसे खुद को आजाद करू , कैनवास पर तस्वीर बनाते बनाते हाथो में रोक लगी ......होंले से गीत गूंजने लगा कानो में पीछे मुड़ कर देखा तो कोई न था हैरानी थी . तस्वीरों के रंग बिगडने लगे और कैनवास पर बना साज बेसुरा सा गीत गाने लगा कमरे की दीवारों पर लगी कुछ तस्वीरे चीख कर डरानी लगी l
....थोड़ी देर बाद यह जादुई गीत कहाँ से आ गया खिडकी खोलकर देखी तो नीचे गहरी खाईया थी. फिर दिल डर कर जोर से धडकने लगा ...जादुई गीत समोहित कर रहा था मुझे अपनी और खीच रहा था एक बार फिर खुद को अकेला पाया खवाब टूट गया .
......कालबेल की आवाज से तन्द्रा भंग सी हों गयी यह खवाब था गहरी नींद से जाग गयी थी
बाहर बारिश हों रही थी . सुबह- सुबह कौन आ गया ?
दीदी जी ..विवेक जी आये है ठीक है उन्हें बैठने को कहो में आती हूँ . मन अनमना सा होने लगा क्यों लोग मेरी तन्हाईयो को छीनने आ जाते है .
धीरे धीरे मौसम खुलने लगा और बाहर की धुप छन कर अन्दर आने लगी शायद कमरे में फैली सीलन को समेटना चाहती हों .
विवेक की मासूमियत पर तरस आता है यह क्यों उसके पीछे भाग रहा है जो उसे कभी नहीं मिल सकती . तुमसे बात करनी है वह बोला अभी में व्यस्त हू मैने उसको टालने की कोशिस की मुझे आफिस के लिए देर हों रही है किसी और दिन ......
वह चला गया मुझे पता था वो क्या कहेगा क्यों मम्मी पापा ने इसे मेरे पीछे क्यों लगा दिया जब मै अपने जख्मो में खुश हूँ .क्यों मरहम लगाते है लोग उनके संवेदनाये ,प्यार मेरे आस पास लिपटे खोल को नहीं खोल सकते ...life is always being a big play and its a drama for me..... .......to be continue... next part very soon.
मन करता है आँखों में एक संसार बसा ले हाथो में हाथ ले ,पतझड़ के मौसम में इन संकरी रहो में हम साथ साथ गुजर जाये . मुझ तक जो पहुचती है इन मासूम आवाजो को में कैसे साज दू . घुटन भरी यादो से में कैसे खुद को आजाद करू , कैनवास पर तस्वीर बनाते बनाते हाथो में रोक लगी ......होंले से गीत गूंजने लगा कानो में पीछे मुड़ कर देखा तो कोई न था हैरानी थी . तस्वीरों के रंग बिगडने लगे और कैनवास पर बना साज बेसुरा सा गीत गाने लगा कमरे की दीवारों पर लगी कुछ तस्वीरे चीख कर डरानी लगी l
....थोड़ी देर बाद यह जादुई गीत कहाँ से आ गया खिडकी खोलकर देखी तो नीचे गहरी खाईया थी. फिर दिल डर कर जोर से धडकने लगा ...जादुई गीत समोहित कर रहा था मुझे अपनी और खीच रहा था एक बार फिर खुद को अकेला पाया खवाब टूट गया .
......कालबेल की आवाज से तन्द्रा भंग सी हों गयी यह खवाब था गहरी नींद से जाग गयी थी
बाहर बारिश हों रही थी . सुबह- सुबह कौन आ गया ?
दीदी जी ..विवेक जी आये है ठीक है उन्हें बैठने को कहो में आती हूँ . मन अनमना सा होने लगा क्यों लोग मेरी तन्हाईयो को छीनने आ जाते है .
धीरे धीरे मौसम खुलने लगा और बाहर की धुप छन कर अन्दर आने लगी शायद कमरे में फैली सीलन को समेटना चाहती हों .
विवेक की मासूमियत पर तरस आता है यह क्यों उसके पीछे भाग रहा है जो उसे कभी नहीं मिल सकती . तुमसे बात करनी है वह बोला अभी में व्यस्त हू मैने उसको टालने की कोशिस की मुझे आफिस के लिए देर हों रही है किसी और दिन ......
वह चला गया मुझे पता था वो क्या कहेगा क्यों मम्मी पापा ने इसे मेरे पीछे क्यों लगा दिया जब मै अपने जख्मो में खुश हूँ .क्यों मरहम लगाते है लोग उनके संवेदनाये ,प्यार मेरे आस पास लिपटे खोल को नहीं खोल सकते ...life is always being a big play and its a drama for me..... .......to be continue... next part very soon.
Tuesday, March 5, 2013
अबोध कन्यायें व यौन अपराध
यौन अपराध :Jagran Junction Forum
छोटी मासूम बच्चियों के साथ होने वाले यौन अपराधों के पीछे आधुनिक महिलाओ को दोष देना औचित्यपूर्ण नही है ।जब किसी महिला के साथ इस तरह की घटना घटती है तो उन्हे ही दोषी ठहराया जाता है । 16 दिसंबर की दिल्ली गैंग रेप घटना को अभी भुला भी नही पाये की इस तरह की घटनाए अभी भी घट रही है फिर भी महिलाओ पर ही दोषारोपण ? कभी उनके पहनावे पर सवाल खडे होते है तो कभी उनके चाल चलन पर । जो लोग दोषी होते है उनके मानसिकता पर, उनके परिवेश पर सवाल क्यो खडे नही होते है अबोध कन्याओ से दुष्कर्म के पीछे कुत्सिक मानसकिता वाले लोगो का हाथ होता है साथ ही यौन अपराधों के पीछे सुरक्षा तंत्र पुलिस व प्रशासन का लापरवाह रवैया जिससे सभी परिचित है । नैतिकता की उम्मीद करना बेकार है क्योकि जिस तरह समाज में विंसग्तियां दिनप्रतिदिन बढती ही जा रही है उसमें यौन संबध को लेकर पैदा हई उत्कंठा ,पानोग्राफी व नशे की लत शराबखोरी ने इन घटनाओ में बढोतरी की है। अबोध बच्चियां किस तरह खुद को बचा सकती है इसके लिए उनके माता-पिता को ही चौकन्ना होना होगा। किसी भी सभ्य समाज पर यह सवालिया निशान है किस तरह का समाजिक ढांचा मौजुदा समय में खडा होता जा रहा है जिस देश में नवरात्र पूजा का चलन हो नन्ही बच्चियों को देवी मान कंचक जमायी जाती है उस देश की संस्कृति का क्या जहां स्कूलो में मातापिता अपनी बच्चियों को शिक्षा लेने के लिए भेजते है वहां उनकी बच्चयों के साथ दुष्कर्म हो ? कितना पतन होगा अब ? मेरे घर में काम करने वाली एक महिला सिर्फ दिल्ली छोडकर एक छोटे शहर में सिर्फ इसलिए रहने आयी है क्योकि उसका यह मानना है कि दिल्ली में लडकियों को घर पर अकेले छोडना सुरक्षित नही है । दिल्ली में ही नही मासूम बच्चियों को अकेले छोडना कही भी सुरक्षित नही आज के माहौल को देखते हुए लोग इस संबध में अपने सगे संबधियों पर भी विश्वास करने को तैयार नही ।
उन लोगो की मानसिकता पर तरस आता है जब छोटी बच्चियां यौनहिसा का शिकार हई तो इस तरह के तर्क बेमानी है कि किसी महिला का पहनावा किस तरह किसी को यौन अपराध के लिए प्रेरित करता है पर यह अध्यन व शोध का विषय हो सकता है यदि कोई महिला छोटे वस्त्र पहनती है तो दुष्कर्म का शिकार होती है। यौन कुठा ,व मानसिक रोग से पीडित व घिनौनी मानसिकता के शिकार वयक्ति ही इन घटनाओ के पीछे जिम्मेदार होते है । निम्न स्तर का जीवन व्यतीत करने वाले शराबी , लावारिस ,मानसिक रूप से विक्षिप्त लोग जो इसी समाज में रहते है इस तरह की हरकते करते है पर फिर भी पहचाने नही जाते । मासूम बच्चियों कभी घर से उठा ले जाते है तो कभी कही सार्वजनिक जगहों पर भी हो सकते है सिर्फ बहस करने से व सोचने से काम नही चलने वाला अपनी मासूम बच्चियों की सुरक्षा हमें ही करनी है पर दुख तो इस बात का है जब शिक्षा के मंदिर में भी हमारी अबोध बच्चियां सुरक्षित नही तो क्या पूरी स्त्री जाति की सुरक्षा पर सवालियां निशान खडे हो उठते है जिन के हल हमें ही ढूढनें है । समय आ गया है जब सरकार को भी इस मसले पर संजीदा होना पडेगा वरना आने वाले समय में भारत देश को,देश में रहने वाली स्त्रियों विश्व में दुखी व विवश नारी जाति के रूप में जाना जायेगा न की एक सुरक्षित स्त्री जाति के रूप में, जब समाज में इस तरह की घटनाये घटनाये घटने के बजाय बढती ही जाये कारणों व हल को जज्बाती ढंग से ढूंढा जाये न की औपचारिक रूप में ......।
छोटी मासूम बच्चियों के साथ होने वाले यौन अपराधों के पीछे आधुनिक महिलाओ को दोष देना औचित्यपूर्ण नही है ।जब किसी महिला के साथ इस तरह की घटना घटती है तो उन्हे ही दोषी ठहराया जाता है । 16 दिसंबर की दिल्ली गैंग रेप घटना को अभी भुला भी नही पाये की इस तरह की घटनाए अभी भी घट रही है फिर भी महिलाओ पर ही दोषारोपण ? कभी उनके पहनावे पर सवाल खडे होते है तो कभी उनके चाल चलन पर । जो लोग दोषी होते है उनके मानसिकता पर, उनके परिवेश पर सवाल क्यो खडे नही होते है अबोध कन्याओ से दुष्कर्म के पीछे कुत्सिक मानसकिता वाले लोगो का हाथ होता है साथ ही यौन अपराधों के पीछे सुरक्षा तंत्र पुलिस व प्रशासन का लापरवाह रवैया जिससे सभी परिचित है । नैतिकता की उम्मीद करना बेकार है क्योकि जिस तरह समाज में विंसग्तियां दिनप्रतिदिन बढती ही जा रही है उसमें यौन संबध को लेकर पैदा हई उत्कंठा ,पानोग्राफी व नशे की लत शराबखोरी ने इन घटनाओ में बढोतरी की है। अबोध बच्चियां किस तरह खुद को बचा सकती है इसके लिए उनके माता-पिता को ही चौकन्ना होना होगा। किसी भी सभ्य समाज पर यह सवालिया निशान है किस तरह का समाजिक ढांचा मौजुदा समय में खडा होता जा रहा है जिस देश में नवरात्र पूजा का चलन हो नन्ही बच्चियों को देवी मान कंचक जमायी जाती है उस देश की संस्कृति का क्या जहां स्कूलो में मातापिता अपनी बच्चियों को शिक्षा लेने के लिए भेजते है वहां उनकी बच्चयों के साथ दुष्कर्म हो ? कितना पतन होगा अब ? मेरे घर में काम करने वाली एक महिला सिर्फ दिल्ली छोडकर एक छोटे शहर में सिर्फ इसलिए रहने आयी है क्योकि उसका यह मानना है कि दिल्ली में लडकियों को घर पर अकेले छोडना सुरक्षित नही है । दिल्ली में ही नही मासूम बच्चियों को अकेले छोडना कही भी सुरक्षित नही आज के माहौल को देखते हुए लोग इस संबध में अपने सगे संबधियों पर भी विश्वास करने को तैयार नही ।
उन लोगो की मानसिकता पर तरस आता है जब छोटी बच्चियां यौनहिसा का शिकार हई तो इस तरह के तर्क बेमानी है कि किसी महिला का पहनावा किस तरह किसी को यौन अपराध के लिए प्रेरित करता है पर यह अध्यन व शोध का विषय हो सकता है यदि कोई महिला छोटे वस्त्र पहनती है तो दुष्कर्म का शिकार होती है। यौन कुठा ,व मानसिक रोग से पीडित व घिनौनी मानसिकता के शिकार वयक्ति ही इन घटनाओ के पीछे जिम्मेदार होते है । निम्न स्तर का जीवन व्यतीत करने वाले शराबी , लावारिस ,मानसिक रूप से विक्षिप्त लोग जो इसी समाज में रहते है इस तरह की हरकते करते है पर फिर भी पहचाने नही जाते । मासूम बच्चियों कभी घर से उठा ले जाते है तो कभी कही सार्वजनिक जगहों पर भी हो सकते है सिर्फ बहस करने से व सोचने से काम नही चलने वाला अपनी मासूम बच्चियों की सुरक्षा हमें ही करनी है पर दुख तो इस बात का है जब शिक्षा के मंदिर में भी हमारी अबोध बच्चियां सुरक्षित नही तो क्या पूरी स्त्री जाति की सुरक्षा पर सवालियां निशान खडे हो उठते है जिन के हल हमें ही ढूढनें है । समय आ गया है जब सरकार को भी इस मसले पर संजीदा होना पडेगा वरना आने वाले समय में भारत देश को,देश में रहने वाली स्त्रियों विश्व में दुखी व विवश नारी जाति के रूप में जाना जायेगा न की एक सुरक्षित स्त्री जाति के रूप में, जब समाज में इस तरह की घटनाये घटनाये घटने के बजाय बढती ही जाये कारणों व हल को जज्बाती ढंग से ढूंढा जाये न की औपचारिक रूप में ......।
Friday, March 1, 2013
Sunday, February 24, 2013
Tuesday, February 19, 2013
Thursday, January 3, 2013
Wednesday, December 19, 2012
कहां सुरक्षित है महिलाएं......?
कहां सुरक्षित है महिलाएं...............................?
दुष्कर्म की इन घटनाओ के पीछे हीन भावना से उपजी यौन कुंठा ,शराबखोरी ,पोनोग्राफी आदि का भी बहुत बडा हाथ होना है । अदालती कार्यवाही में देर होना कानुनों का खौफ न होना ,पीडिता को पुलिस के पास न जाने देना समाजिक अपमान के कारण कई घरों में ही महिलाएं घुटती है व आत्महत्या को अन्जाम दे देती है ।
सिर्फ आक्रोश होने से ही इन घटनाओ का टलना बन्द नही होगा समाज में रहने वाले कितने ही विकृत मानसकिता के लोग है जो समान्य लोगों के साथ तो रहते है पर पहचाने नही जाते जब इस तरह की घटना घटती है तो चेतना जगती है सवाल खडे हो उठते है व विकास के नाम जो तरक्की हई वह खोखली लगती है और अराजकतावादी युग की याद ताजा हो जाती है ।
दिल्ली में चलती बस में युवती के साथ हुए घिनौने दुष्कर्म की घटना ने सभी को डरा दिया है । इस तरह की दिल दहलाने वाले घटनाओ ने महिलाओ की सुरक्षा पर प्रश्न चिहन लगा दिये है । आज न तो वह घर में ही पूरी तरह सुरक्षित है न ही बाहर । समाज जो आधुनिकता का दावा करता है फिर इस तरह की बर्बरता ? इंसानी दरिंदगी का यह कौन सा रूप है जो आदमी का जानवर से भी अधिक घृणात्मक बनाता है। कहां पैदा होते है इस तरह के इन्सान जिन्हे इंसान कहना इंसानियत की तौहीन होगी ।
डरे है वह माता-पिता जो अपनी लडकियों का घर बाहर जाने देते है उन्हे याद आते अपने पुर्वजों के वह शब्द लडकियों घरों से निकलने न दो सिर्फ चार दीवारों में कैद रखो...............
डरे है वह माता-पिता जो अपनी लडकियों का घर बाहर जाने देते है उन्हे याद आते अपने पुर्वजों के वह शब्द लडकियों घरों से निकलने न दो सिर्फ चार दीवारों में कैद रखो...............
क्या घरों में भी महफूज होती है हमारी बच्चियां , हमारी बहने, माताएं शायद इसका जवाब पुरी तरह सकारात्मकता में नही मिलता ?
दुष्कर्म की इन घटनाओ के पीछे हीन भावना से उपजी यौन कुंठा ,शराबखोरी ,पोनोग्राफी आदि का भी बहुत बडा हाथ होना है । अदालती कार्यवाही में देर होना कानुनों का खौफ न होना ,पीडिता को पुलिस के पास न जाने देना समाजिक अपमान के कारण कई घरों में ही महिलाएं घुटती है व आत्महत्या को अन्जाम दे देती है ।
सिर्फ आक्रोश होने से ही इन घटनाओ का टलना बन्द नही होगा समाज में रहने वाले कितने ही विकृत मानसकिता के लोग है जो समान्य लोगों के साथ तो रहते है पर पहचाने नही जाते जब इस तरह की घटना घटती है तो चेतना जगती है सवाल खडे हो उठते है व विकास के नाम जो तरक्की हई वह खोखली लगती है और अराजकतावादी युग की याद ताजा हो जाती है ।
Sunday, December 2, 2012
Ganga ke Kareeb: श्रद्वालुओ की सिद्वियों का केन्द्र भैरव मंदिर .......
Ganga ke Kareeb: श्रद्वालुओ की सिद्वियों का केन्द्र भैरव मंदिर .......: शिव की अनेक अशांत मुर्तिया उस वर्ग की है ,जो उनसे संबद्व किसी पौराणिक कथा का चित्रण नही करती अथवा उसमें कथा तत्व अस्पष्ट होता है । इसी तथ...
Wednesday, November 28, 2012
Ganga ke Kareeb: श्रद्वालुओं की सिद्वियों का केन्द्र...........भैरव मंदिर ऋषिकेश
ganga ke Kareeb: श्रद्वालुओं की सिद्वियों का केन्द्र...........भैरव मंदिर ऋषिकेश
for more plz visit blog Ganga ke Kareeb here is the link
http://sunitakhatri.blogspot.com
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डायन ******* जब से पडोस में आयी .....एक एक कर सबकों निगले जा रही है डायन .....!!!! उसकी चमकती आँखों में एक अजीब से प्यास दिखती थी बाल ...
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