जिन्दगी के उतार चढाव में झांकने की एक कोशिश का नाम है जीवन धारा। बह रहे है इस धार में या मंझधार में कौन जाने?
Tuesday, December 27, 2011
Friday, December 9, 2011
जिन्दगी से कितना दूर भागोगे तुम...................!
जिन्दगी से कितना दूर भागोगे
यह हर नया रूप धरती है
तुम हो जाते हो अंचभित
कभी कभी डरते हो
कभी डटते हो
कभी जिद करते हो
चाहोगे जिस दिन जीना
मौत तुम्हे डरायेगी,रूलायेगी
जिसे दिन चाहोगे तुम
कहना इसे अब अलविदा
जिन्दगी तुम्हे ललचायेगी
जीने पर कर देगी विवश
न चाहते हुए भी.................।
तोड देगी तुम्हारे हर
उस भ्रम को जो देता
रहा तुम्हे जिन्दगी
कब तक झूठ के सहारे
जीने का बहाना करते रहे तुम!
वो फरेब के सहारे
रचता रहा हर रोज
कहानियां सिर्फ ,जिन्दगी
जब आईना दिखायेगी
कैसे खुद से नजरे
मिलायेगी जिन्दगी.....................!
यह हर नया रूप धरती है
तुम हो जाते हो अंचभित
कभी कभी डरते हो
कभी डटते हो
कभी जिद करते हो
चाहोगे जिस दिन जीना
मौत तुम्हे डरायेगी,रूलायेगी
जिसे दिन चाहोगे तुम
कहना इसे अब अलविदा
जिन्दगी तुम्हे ललचायेगी
जीने पर कर देगी विवश
न चाहते हुए भी.................।
तोड देगी तुम्हारे हर
उस भ्रम को जो देता
रहा तुम्हे जिन्दगी
कब तक झूठ के सहारे
जीने का बहाना करते रहे तुम!
वो फरेब के सहारे
रचता रहा हर रोज
कहानियां सिर्फ ,जिन्दगी
जब आईना दिखायेगी
कैसे खुद से नजरे
मिलायेगी जिन्दगी.....................!
Monday, December 5, 2011
जो नही है साथ...................!
जो नही है साथ ,भारतीय सिनेमा का सदाबहार अभिनेता देवआन्नद जिन्होने बरसों तक आम जनमानस के दिलों पर राज किया । उनकी मृत्यु से सभी को धक्का सा लगा है बालीवुड उदास है पर आम लोगो में भी एक उदासी घिर आयी है । यह जीवन है जो आया है जायेगा भी बस पहचाना जायेगा तो अपने कर्मो से कोई किसी तरह अपनी क्षमता योग्यता से समाज में अपनी छवि तो बनाता ही है बस उसी के आधार पर जीवनधारा बहती है साथ ही इस जीवनधारा में शामिल होते है लोग हमारे सुख दुख में यही जीवन है। इसी तरह जीवन जीते है देव आन्नद अपनी फिल्मों में किये गये अभिनय के लिए अपनी बनायी फिल्मों के जरिये आज भी हमारें साथ यह कह कि वह नही है हमारे बीच तो उनका अनादर ही होगा क्योकि अपनी कर्मो के लिए जब हम किसी को याद करते है वह उसे अमरता की ओर ले जाते है वह तो कर्मयोगी ही थें अपनी अदाओ से अभिनय से और सबसे अलग अन्दाज से जनमानस के दिलों में गहरी जगह बनायी थी ।
एक उदासी सी है वातावरण में यह कब तक जायेगी नही पता ........................
Thursday, November 17, 2011
बेरहम है जिन्दगी.....!
बेरहम है जिन्दगी तू
हरदम नया रंग दिखाती है
तोड देती है है सपनों को
फिर नया ख्वाब दिखाती है।
बेदहम है जिन्दगी तू
मौत का समान बेचती है
आज कहू तूझे जिन्दगी
पल में मौत बन खडी हो जाती है
कही दूर कोई किल्कारी सूनाई
पडती कानों में लगता अभी नही
विराम फिर राह पर चल पडती जिन्दगी
वक्त काटना भी मानों हो एक सजा
पर वक्त को भी कभी कभी
झुका देती है जिन्दगी ।
हरदम नया रंग दिखाती है
तोड देती है है सपनों को
फिर नया ख्वाब दिखाती है।
बेदहम है जिन्दगी तू
मौत का समान बेचती है
आज कहू तूझे जिन्दगी
पल में मौत बन खडी हो जाती है
कही दूर कोई किल्कारी सूनाई
पडती कानों में लगता अभी नही
विराम फिर राह पर चल पडती जिन्दगी
वक्त काटना भी मानों हो एक सजा
पर वक्त को भी कभी कभी
झुका देती है जिन्दगी ।
Monday, October 24, 2011
Wednesday, October 12, 2011
करवाचौथ व्रत, संजीवनी वैवाहिक रिश्तें की
हमारे देश में कितने त्यौहार है गिनती नही की जा सकती शायद हर मौसम के हर रिश्तें के अलग अलग त्यौहार है सचमुच रिश्तों को भी त्यौहारों में लपेट कर संस्कारों से बांध हर रिश्तें को मजबूत बनाने का प्रयास किया गया है धार्मिक दृष्टि कोण को न देख कर यदि हिन्दुओ में वैवाहिक रिश्तें को अटूट बनाता हुआ आ रहा है करवाचौथ का त्यौहार। मीडिया की दखअंदाजी ने इसे नये आयाम दे दिये है ।
करवाचौथ का त्यौहार वास्तव में पति पत्नी के रिश्तें को संजीवनी प्रदान करता है जो रिशता जिम्मेदारियों के बोझ तले उन्हे खुद के बारे में सोचने का समय तो देता व देता उन पुरानी यादों को उम्र के साथ धुंधली पडती जाती है । सुहागने दिन भर निर्जल व्रत रख इस अपने सुहाग के लिए लम्बी उम्र की दुआए मागती है जिनका विवाह नही हुआ वह अपने लिए वर की कामना रखती है ।
यहां मेरा मकसद इस त्यौहार व व्रत का बखान करना या उसके धार्मिक व समाजिकता का वर्णन करना नही है क्योकि यह सभी जानते है व परम्पराओ का पालन भी करते है किन्तु जिस तरह विवाह संस्था में आज के समय में बदलाव आये है वहां इस तरह के धार्मिक आयोजनों महत्व और भी बढ जाता है व रिश्तों में पहले से अधिक प्रगाढता आ जाती है क्या अन्य संबधो जैसे लिवइनरिलेशन मे इस तरह के संस्कार संभव है जिसे आज की महानगरीय पीढी ने अपनाया । क्या हमारे ,धार्मिक संस्कार जो विवाह जैसी संस्था में संभव है आज पहले से भी अधिक प्रांसगिक नही ?
करवाचौथ का त्यौहार वास्तव में पति पत्नी के रिश्तें को संजीवनी प्रदान करता है जो रिशता जिम्मेदारियों के बोझ तले उन्हे खुद के बारे में सोचने का समय तो देता व देता उन पुरानी यादों को उम्र के साथ धुंधली पडती जाती है । सुहागने दिन भर निर्जल व्रत रख इस अपने सुहाग के लिए लम्बी उम्र की दुआए मागती है जिनका विवाह नही हुआ वह अपने लिए वर की कामना रखती है ।
यहां मेरा मकसद इस त्यौहार व व्रत का बखान करना या उसके धार्मिक व समाजिकता का वर्णन करना नही है क्योकि यह सभी जानते है व परम्पराओ का पालन भी करते है किन्तु जिस तरह विवाह संस्था में आज के समय में बदलाव आये है वहां इस तरह के धार्मिक आयोजनों महत्व और भी बढ जाता है व रिश्तों में पहले से अधिक प्रगाढता आ जाती है क्या अन्य संबधो जैसे लिवइनरिलेशन मे इस तरह के संस्कार संभव है जिसे आज की महानगरीय पीढी ने अपनाया । क्या हमारे ,धार्मिक संस्कार जो विवाह जैसी संस्था में संभव है आज पहले से भी अधिक प्रांसगिक नही ?
Monday, September 19, 2011
जो नही है साथ...................!
जीवन में कितने ही उतार चढाव आते है पर जीवन कभी नही रूकता अगर कभी तुम थकने लगो कुछ नये रंग भरो रोज के थकाने वाले ढर्रे को छोड हमेशा नया करते रहने की सोचते रहे । जो ठहर जाये वह पानी नही क्योंकि ठहरे हुए पानी में वह बात नही होते जो बहते हुए पानी में होती है दोस्तों कभी जिन्दगी से तंग आकर लगे तब यह सोचना हम यहां क्यों इस संसार में क्यों क्या मकसद था परमात्मा का जो उसने हमें हमारें रूप में यह जीवन जीने को दिया क्या सचमुच यह हमारी इच्छा थी क्योकि इन्सान जो चाहता वह कभी नही होता है जो कुछ होता उस पर हमारा बस नही हम सिर्फ कठपुतली है जिन्हें किसी के इशारों पर नाचना पर मेरा यह मानना है अपने जीवन की बागडोर ईश्वर के अलावा किसी अन्य के हाथों में नही सौपनी नही चाहिए।
समय चल रहा है श्राद्व का अपने पितरों को याद करने का उन्हें श्रद्वाजलिं देने का पर क्या बाकी समय धार्मिक कर्मकाण्डों के अलावा हम अपने दिवगतों को याद कर पाते है । शायद याद तो हमेशा ही रहती है मन में जिनके अपने उन्हे छोड अकेला कर चले जातें है उनसे पूछे क्या उन्हे उम्र यह दुख नही रहता कि वह होता/होती तो जिन्दगी का कुछ अलग ही रंग होता ।
किसी के भी दुख को स्थायी नही बनने दे यह जिन्दगी खूबसुरत होती है फर्क यह है कि हम हर परिस्थिति में सच्चे इन्सान के रूप में हमेशा हंसते रहे अपनी हर पीडा को भुला कर।
जो झलक जाये वह आंसु नही.........................................।
समय चल रहा है श्राद्व का अपने पितरों को याद करने का उन्हें श्रद्वाजलिं देने का पर क्या बाकी समय धार्मिक कर्मकाण्डों के अलावा हम अपने दिवगतों को याद कर पाते है । शायद याद तो हमेशा ही रहती है मन में जिनके अपने उन्हे छोड अकेला कर चले जातें है उनसे पूछे क्या उन्हे उम्र यह दुख नही रहता कि वह होता/होती तो जिन्दगी का कुछ अलग ही रंग होता ।
किसी के भी दुख को स्थायी नही बनने दे यह जिन्दगी खूबसुरत होती है फर्क यह है कि हम हर परिस्थिति में सच्चे इन्सान के रूप में हमेशा हंसते रहे अपनी हर पीडा को भुला कर।
जो झलक जाये वह आंसु नही.........................................।
Sunday, August 21, 2011
Sunday, July 17, 2011
रास्ता कब खत्म हो चला.......!
जिन्दगी कहां ले चली तू मुझे
रास्ता कब खत्म हो गया
सफर तो कही अधूरा- सा
अब कब तूझसे रूबरू
क्या कभी नया ख्वाब .............!
दिखाकर गुम हो जायेगी खुशी
वो कौन सा मोड है जहां
तुझे ढूंढ लूगी मै ........!
जिन्दगी क्या है तेरा नया रंग
किसको जोडू किससे मुंह मोडु
रिश्तें कही न कही
जख्म दे रिसते ही रहे
वो कौन सा आसमां है
जिसे कहूं तू मेरा है........!
अब मेरी जां मेरी भी
नही उस पर हक है
किसी न किसी का
जिन्दगी अब क्या है मेरे वास्ते
चाहूं भी तूझमें मेरा अक्श
नही दिखता ...........
कहने को तो है
सितारे बहुत
एक चांद भी अपना नही लगता.......!
परायी जमीन पर
घर की इमारत
प्यारा एक धोखा है
फिर भी धोखे में जिये जा रही है जिन्दगी।
रास्ता कब खत्म हो गया
सफर तो कही अधूरा- सा
अब कब तूझसे रूबरू
क्या कभी नया ख्वाब .............!
दिखाकर गुम हो जायेगी खुशी
वो कौन सा मोड है जहां
तुझे ढूंढ लूगी मै ........!
जिन्दगी क्या है तेरा नया रंग
किसको जोडू किससे मुंह मोडु
रिश्तें कही न कही
जख्म दे रिसते ही रहे
वो कौन सा आसमां है
जिसे कहूं तू मेरा है........!
अब मेरी जां मेरी भी
नही उस पर हक है
किसी न किसी का
जिन्दगी अब क्या है मेरे वास्ते
चाहूं भी तूझमें मेरा अक्श
नही दिखता ...........
कहने को तो है
सितारे बहुत
एक चांद भी अपना नही लगता.......!
परायी जमीन पर
घर की इमारत
प्यारा एक धोखा है
फिर भी धोखे में जिये जा रही है जिन्दगी।
Monday, May 9, 2011
sorry Mama.......!
मम्मा, सारी, मै आपके लिए कुछ नही ला पायी मैने सोचा मै आपको आपको एक नैकलैस गिफट करू । पापा क्या आप मेरी मम्मा के लिए नेकलैस ला देगे? मै कैसे बाजार जाउ? मम्मा आज मैदर्स डे है, न पापा को बोलो न मेरे साथ चले !अपनी नन्ही सी गुडिया के मुंह ऎसी बाते सुन कर मै हैरान हो गयी मेरी आंखो मे आंसू आ गये इतना छोटा बच्चा इतनी फींलिग्स वो अभी सिर्फ यूकेजी में पढती है ।मैने उसको कहा की आज मैदर्स डे नही है पर उसने टीवी पर दिखाया देखो मम्मा !
टीवी देखते- देखते बच्चे काफी कुछ सीख जाते है जो हम उन्हे कभी नही बताते टीवी उन्हे बहुत कुछ सिखा रहा है । लडकिया अपने माता पिता के प्रति कुछ ज्यादा ही संवेदनशील होती है लडको में यह संवेदनशीलता कम होती है
वह अपनी दुनिया में ज्यादा मशगुल रहते है ।
बचपन मे एक कहानी पढी थी जिसमें हमीद नाम का बालक मेले में दूसरे बच्चों की तरह पैसे अपने लिए न खर्च कर अपनी मां के लिए एक चिमटा लाना पसन्द करता है क्योकि रोटी बनाते वक्त उसकी मां के हाथ जल जाते थे । कहते है पूत के पांव पालने में ही दिख जाते है ।
कभी -कभी बहुत दुख होता है जब यह खबर सुनने को मिलती है किसी के युवा पुत्र की मृत्यु आसयमिक हो जाती है या वह खुद ही मृत्यु को गले लगा लेता वह स्थिति उन माता पिता पर कितनी भारी गुजरती है इसकी कल्पना कर पाना भी दुखद है । सहनशीलता का हास जो आजकल देखने को मिलता है जीवन से घबरा जाते है कठिन परिस्थतियों को नही झेल पाते है । सवाल यह उठता है कि आज के समाजिक परिवेश मे बच्चों की परवरिश किस ढंग से की जाये की वह बडे होकर सहनशील बने दुसरों को सहारा देने के लायक बने न कि सिर्फ स्वार्थ में अपने ही हित के बारे में सोचे ।
टीवी देखते- देखते बच्चे काफी कुछ सीख जाते है जो हम उन्हे कभी नही बताते टीवी उन्हे बहुत कुछ सिखा रहा है । लडकिया अपने माता पिता के प्रति कुछ ज्यादा ही संवेदनशील होती है लडको में यह संवेदनशीलता कम होती है
वह अपनी दुनिया में ज्यादा मशगुल रहते है ।
बचपन मे एक कहानी पढी थी जिसमें हमीद नाम का बालक मेले में दूसरे बच्चों की तरह पैसे अपने लिए न खर्च कर अपनी मां के लिए एक चिमटा लाना पसन्द करता है क्योकि रोटी बनाते वक्त उसकी मां के हाथ जल जाते थे । कहते है पूत के पांव पालने में ही दिख जाते है ।
कभी -कभी बहुत दुख होता है जब यह खबर सुनने को मिलती है किसी के युवा पुत्र की मृत्यु आसयमिक हो जाती है या वह खुद ही मृत्यु को गले लगा लेता वह स्थिति उन माता पिता पर कितनी भारी गुजरती है इसकी कल्पना कर पाना भी दुखद है । सहनशीलता का हास जो आजकल देखने को मिलता है जीवन से घबरा जाते है कठिन परिस्थतियों को नही झेल पाते है । सवाल यह उठता है कि आज के समाजिक परिवेश मे बच्चों की परवरिश किस ढंग से की जाये की वह बडे होकर सहनशील बने दुसरों को सहारा देने के लायक बने न कि सिर्फ स्वार्थ में अपने ही हित के बारे में सोचे ।
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