सादगी

सादगी
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पता नही ....क्या होता जा रहा है विभा को हर वक्त आइना के आगे खड़ी रहती है...जब सही समय था तो सबको सादगी से रहने का भाषण देती अब खुद को किसी मॉडल से कम नही समझती अब जब चालीस बंसत पार कर चुकी अपने बेढब हुए पेट को चुस्त जींस पर लटकते हुए टॉप से ढक कर आधुनिक परिधान पहन कर जाने किसे रिझाने की असफल कोशिशों को, कामयाब करना चाहती है..यह.. उसको देखती हूँ तो  या तो हंसी अाती है फिर अफ़सोस होता है.
यह कैसे कपडे पहने है विभा तुमने ? कयूं  क्या खराबी है इनमें ठीक तो मै कितनी अच्छी लगती हूँ..जींस टाप ही तो है जो तुम मुझे घूर रही हो तुम भी तो पहनती हो न ???
उसमे कोई खराबी नही पर कुछ तो उम्र का ख्याल करो तो, इतना भी क्या पर वो कब सुनने वाली थी.
यह वही विभा  है जो शादी से पहले सादगी की मूर्ति बन औरों को भी सादगी से रहने का भाषण दिया करती थी...कहती थी अगर हम साधारण वेशभूषा धारण करते है तो कही भी आ जा सकते फैशन में रहकर सबकी नजरे हम पर ही टिकी रहती है  और काम करने से लेकर कही अाने जाने में लोगो की निगाहों में हमी होते हैं . इतने सालों बाद न जाने विभा की जिंदगी किस दौर से गुजरी की वह बदल गयी यह वो नही थी जिसे मै जानती थी.
जब उसने आप बीती सुनाई तो मै दंग रह गयी.. विभा का विवाह एक एेसा इंसान के साथ हुआ जो आधुनिक ख्यालों का था उसे फैशनेबल कपड़ों का चाव था वह खुद भी अप टू डेट बना फिरता था ..उसे विभा की सादगी जरा भी पंसद न अायी वह अाये दिन उसे नीचा दिखाता ..और गंवार जाहिल के तानों से उसके दिल को छेद डालता.
विभा ने उसे खुश करने की हर संभव कोशिश की पर उसके दामन में कोई खुशी न आयी.
विभा ने खुद को पूरी तरह बदल लिया हेयर स्टाइल से लेकर हर वो अाधुनिक परिधान उसके पास था जिन्हें देख वह नाक भौं बनाया करती थी. फिर भी वो तन्हा थी उसका हमराज उसके साथ कहाँ था ....क्या दिया सादगी ने विभा को.    
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सुनीता
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