Wednesday, July 25, 2018

पश्चाताप की ज्वाला  - 2
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…“ मम्मा पापा कब वापस आयेगे ...अपने खिलौने फैला रिन्कू ने माँ से पूछा, “  क्यो ? यह खिलौने क्यों फैलाये तुमने …”
जीया ने रिन्कू को डाँटा |

“इसमें एक भी बडी वाली गुडियाँ नही है मुझे भी बडी गुडिया चाहिए  | पापा को लैटर लिखों बोलो मेरे लिए बहुत बडी गुडिया लाये जिसे मै नहलाऊंगी  | जैसे मौसी नहलाती है अपने बेबी को मै बिलकुल वैसे ही नहलाऊंगी ,” रिन्कू ने अपनी रौ में जवाब दिया लेकिन माँ सोच में पड गयी  ! तो यह अपनी मौसी की देखा देखी नकल कर रही है मौसी का असर बच्चों पर पड रहा है | यह जीया से अनदेखा न हुआ वह समझ गयी | अब तो रिन्कू को समझा भी नही सकती क्योकि वह एक नम्बर की जिद्दी लड़की थी , छोटी थी इसलिए जीया ने फिर भी कोशिश की , “ अच्छे बच्चे जिद नही करते |”
रिन्कू चीखने लगी , “ मुझे बडी वाली डॉल चाहिए बस पापा को अभी लेटर लिखों मेरे लिए डॉल लेकर आये ”और नाराज़ हो मौसी के कमरे में चली गयी जीया उसको बुलाती रही वह नही आयी छोटे बच्चें के साथ खेलने लगी | जीया उसे कैसे समझा़ये कि  उसके पापा विदेश गये है | जहाँ से वापस आने में अभी बहुत समय बाकी है, जीया का मन वैसे भी नही लग रहा था वह पहली बार पति से दूर हुई है छोटी बहन को अब फुर्सत ही कहाँ है कि वह जो उसकी परवाह करे जबसे दीपक यहाँ रहने उसके तो रंग ढंग ही बदल गये माँ पिताजी भी उसी के रंग में रंगते जा रहे थे | क्यो न हो , था तो वह  छोटा दमाद ! अपनी कोई कसर न छोडता ससुर के इर्द गिर्द ही नाचता रहता जब से उसके पति व बडा दमाद काम के सिलसिले में विदेश चले गये रीया व माँ बडे खुश रहते नये दमाद दीपक की आवभगत में कोई कमी न रहती |
पिताजी ही हालचाल पूछते माँ को तो उसकी परवाह ही नही रही  बच्चे साथ थे फिर भी अकेलापन काटने को दौडता | नन्नू चिडचिडा हो रहा था , मौसा को देखता तो अपने पिता को और अधिक याद करता जबसे रीया व उसका पति यहाँ आकर रहने लगे थे  तब से जीया के बच्चे खुद को अकेला पाते लेकिन उनके नाना इस बात को भलि भाँति समझते थे , वह कोशिश करते दोनो बेटियों के परिवारों में तालमेल बैठाने की किन्तु बडे दामाद के बाहर जाने से बच्चों का मन  नही लगता ..वह कहते थोडे दिन की ही तो बात है जब उनका बडा दामाद वापस आ जायेगा तो पूरा परिवार भैरों बाबा पर माथा टिकाने जायेगा जिनकों वह बहुत मानते थे उन्ही की कृपा से दो नाती मिले …. अब तो नाना -नानी  बच्चों के साथ समय बिताते | कारोबार व बाहरी कामों की बागडोर दीपक के हाथों में आ चुकी थी |
अपने घर शहर वापस लौटने का वह नाम भी न  लेता उस पर रीया कहती फिरती….. “ जीजा जी के घर में न होने से उसके पति दीपक ने परिवार की जिम्मेदारी अच्छे से संभाल ली है |” माँ को कहती,  “ क्यो न उसे व दीपक को भी हमेशा के लिए यही रख लिया जाये जैसे दीदी-जीजाजी व उनके बच्चों को इसी घर में रखा हुआ है शादी के बाद से दीदी तो अपने ससुराल मेहमानों की तरह जाती है उल्टे वही लोग यहाँ आते है |”
जीया सारी बातें सुन के भी अनसुना करती रही यही सोच यह अभी समझदार नही है शायद रीया को याद नही  उसके शादी के बाद से ही पति को पिता ने दमाद नही बेटा बना कर अपने पास रखा था |
…….

जीया की तबियत बहुत खराब थी उस दिन , सभी उसके ईर्द गिर्द थे रीया भी बडी बहन की देखरेख में जुटी थी | रिन्कू भी अपनी माँ के पास थी माँ की आँखे खुल ही नही थी | डॉ0ने वी.पी लो बताया साथ ही बुखार से जीया का पूरा शरीर अकडा हुआ था बच्चे परेशान थे ...रिन्कू रोने लगी, “ अब कभी बडी वाली गुडिया नही माँगुगी  भैया पापा को कर लेटर लिख मम्मा की तबियत खराब उनसे कहना जल्द आ जाना चाहे गुडिया भी न लाना पर जल्द आना मै भी गुस्सा नही करूंगी |” मौसी समझाती है, “ तुम्हारी मम्मा ठीक हो जायेगी | ”

जीया की तबियत बिगड रही थी तो दीपक सलाह देता है मेरे शहर अच्छे व बडे बडे डॉ0 है दीदी को वही दिखला देते है यहाँ के डॉक्टरों के इलाज से कुछ फायदा नही हो रहा |
पिताजी मना करते है लेकिन माँ अनुमति दे देती है , जीया ,  रीया ,दीपक रिन्कू नन्नू व छोटा बच्चा सभी जीया के इलाज के लिए रवाना हो जाते है | पिताजी ने इसके लिए दीपक को बहुत बडी रकम दी ताकि जीया के इलाज में किसी तरह की रूकावट न आये |
रीया काफी दिनों बाद अपने ससुराल के घर में पंहुची रीया को सब समेटना पडा  | घर गन्दा था व बन्द था क्योकि वहाँ कोई न था सभी वहाँ से जा चुके थे रीया दीपक से पूछती है तुम्हारे भैया भाभी कहँ गये तो वह टाल देता है कहता वह नये मकान में शिफ्ट हो गये है |
अगले दिन दीपक जीया को एक प्राईवेट डॉ0 के पास ले जाता है |
वह जीया का मुआयना कर कहता है इन्हे कोई बीमारी नही है बस मानसिक तनाव है जिस वजह से इनकी यह हालत है इन्हे किसी भी तरह का तनाव न दे साथ ही वह कुछ दवायें भी लिखता है कहता यदि  आराम न हो तो वह दुबारा आ सकते है |
रीया अपनी बहन की पूरी देखभाल करती है वह थोडे ही समय में बिलकुल ठीक हो जाती है रीया अब दीपक का अहसान मानने लगी कि उसकी वजह से दीदी की तबियत ठीक हो गयी |

जीया की तबियत संभलनी लगी तो सभी घर वापस आ गये |
जिस व्यक्ति को कोई पंसद नही करते था वह एकदम से हीरो बन गया जीया के बच्चे भी मौसा मौसा करते उसके आगे पीछे घुमते परिवार में वह रोल मॉडल बन चुका था वजह जीया की इलाज उसने अच्छे से कराया , पिताजी भी उस पर निर्भर रहने लगे  नन्नू भी मौसा मौसा करता पिता के अभाव की पूर्ति कर रहा था | उसके इन सभी कोशिशों के पीछे कितना बडा फरेब था नियति देख रही थी..
बुढे  हो चले नाना को को उस पर इतबार करना ही होता लेकिन न जाने क्यों कुछ था जो उन्हे खटक रहा था | दीपक अब पूरी तरह परिवार का हिस्सा बन चुका था जीया के बच्चों को अपनी रिश्तेदारी में घुमाता जो नही करने चाहिए वही  जान बूझ कर गलत काम करना सिखाते बच्चों कों नन्नू गन्दी गन्दी किताबें पढता रिन्कू मौसी की तरह बनती जा रही थी |
जीया यह सब देख घुट रही थी लेकिन कमजोर शरीर और पति की अनुस्पथिति ने उसे तोड कर रख दिया अभी उसे वापस आने में समय था पत्र व फोन से वह सबके हाल चाल पूछते रहते |
वक्त अपनी रफ्तार से दौड रहा था दीपक नये शहर में खुद को अच्छे स्थापित कर चुका था अपना खुद का काम भी वही जमा लिया |  जब बडा दामाद विदेश से वापस घर पंहुच गया बच्चे बहुत खुश हुए जीया भी काफी खुश थी आखिर इतने दिनों के बाद उसका पति वापस आया , लेकिन रीया व दीपक के माथे के बल साफ नजर आ रहे थे जिसे पिताजी की बूढी अनुभवी ने साफ पहचान लि़या | वह बहुत खुश थे उनका दामाद या बेटा आ चुका था |
पापा मेरे लिए क्या लाये रिन्कू दौड कर पापा के गले लग गयी अभी बताता हूं सबने घेर लिया सबके चेहरे पर हंसी थी ….रीया अपने बच्चे के साथ एक कोने में खडी थी ...दीपक कही घुमने निकल गया पिताजी का चेहरा देखने लायक था इतने दिन उन्होने अपने प्रिय के अभाव में कैसे बिताये वही जानते थे वह प्रसन्न थे  “ अरे कालू कहां मर गया ” ! नौकर को आवाज लगाने लगे , … “ जा पूरे मौहल्ले में लड्डू बाँट आ मेरा बेटा घर आया है इतने दिनों बाद ”!

पापा ने नन्नू को अपने पास बुलाया  पछा , “ तुमने पढाई की न ढंग से ?” ‘  हां पापा ’ उसने सर झुका लिया !
“ रिन्कू यह लो तुम्हारी बडी वाली गुडिया !”

“ओह ! यह तो बहुत बडी है बिल्कुल मौसी के बेबी जैसी अब मै इसको रोज नहलाऊंगी” !
“नानी  , मौसी हंसने लगे फिर माँ जीया से जा लिपटी  “ मम्मा तुमने मेरे लिए गुडिया मंगवा दी पापा को लैटर में लिखा मेरी प्यारी मम्मा तुम बहुत अच्छी हो!”

फिर अपनी डॉल से खेलने लगी | “ अरे रीया तुम वहाँ क्यो खडी यहाँ आओ यह देखों मुन्ना के लिए  !” फिर उन्होने बहुत से कपडे खिलौने के पैकेट रीया को पकडा दिये | “ माँ , पिताजी यह तुम्हारे लिए !”, “ इसकी क्या जरूरत थी दामाद जी ”
“जो मुझे समझ आया,  मै ले आया समय का अभाव था ,
कुछ समय बाद फिर जाना होगा वहाँ एक ओर नया प्रोजेक्ट शुरू होगा |”
जीया की तरफ देखा फिर उसका हाथ पकड कमरे में ले गये “तुम्हारी तबियत ठीक है मै तुम्हे अपने साथ ले जाऊंगा अबकी बार ” , “ मै ठीक हूं ” जीया मुस्कुरा दी उस मुस्कान में दर्द था |

बडे दामाद के विदेश से वापस आने के बाद घर में उत्सव का माहौल था ...उनके बाहर जाते ही परिवार में बहुत बदलाव आ चुका था जिसे वह महसुस कर रहे थे |
रीया का बच्चा बोलना सीख रहा था बडे मौसा उसे बहुत प्यार करते समय मिलने पर उसके साथ खेलते व घुमाते वह उनका लाडला बन चुका था  , वही नन्नू उनका खुद का बेटा पढाई में निरन्तर पिछड रहा था छोटे मौसा-मौसी ने नन्नू और रिन्कू को अपने प्रभाव में लिया हुआ था दोनो बच्चे पिता के पास कम व छोटे मौसा के साथ अधिक समय बिताते  थे |
जीया छोटी बहन का पति होने के कारण कुछ कह न पाती उस पर मां को वही पंसद था ! मां के आस-पास रहने की कोशिश करता | सासुमां खुश रहती उससे जबकि ससुर को बडा दामाद ही प्रिय था उसके आने के बाद जब दोनो ने कामकाज की खबर ली तो उसकी कारगुजारियां सामने आयी | बाजार में अपना काम जमाने के लिए बहुत से लोगो से कर्ज लिया था जो लोग उनके विरूद्ध रहते थे | वह सब समझ रहे थे पर बेटी नाती और पत्नी ने बेबस बना दिया कि वह चाह के भी कुछ न कर पाते ...एक बार पत्नी को बताने की कोशिश की तो उसने बडे की तरफ जारी व छोटे को स्वीकार न करने का लांछन लगा दिया पति पर ! निपट गंवार स्त्री उसकी धूर्तता को भी नही देख पा रही थी बस अपनी छोटी बेटी-दामाद के प्यार में अंधी बनी रही |
जीया को कभी -कभी पश्चाताप होता कि  उसने छोटी बहन व उसके परिवार को अपने घर में रख कही गलत तो नही कर दिया |
रीया की आदत थी बात बात पर ताना देने की , “ दीदी बीमार हुई तो दीपक ने ही उनका इलाज करवाया जीजा जी तो विदेश में ऐश कर रहे  थे जबकि दुख तकलीफ दीपक ने बरदाश्त की ! ” उसकी यही बातें दीदी को चोट पंहुचाती न जाने रीया इतना कैसे बदल गयी वह अक्सर यही सोचती कि यही वह उनकी छोटी बहन है जिसकों उसके जीजा व उसने इतना प्यार दिया दीपक से शादी के बाद वह बिल्कुल ही बदल चुकी थी |
नन्नू रिन्कू मौसा मौसी के कहने में रहते तो तो दीदी जीजा अपना सारा प्यार रीया के छोटे बच्चे के ऊपर लुटाते रहे वक्त बीतता रहा |
अचानक जीया की तबियत बहुत  खराब हुई दोबारा तो दीपक व रीया ने उसी डॉ0के पास जाने को कहा जहाँ जीया का पहले इलाज हुआ था , जीया के पति रवीश नेे मना कर दिया  वह अब अपने आप ईलाज करवायेंगे | वह रीया के तानों को अपने कानों से सुन चुके थे |

रीया  और दीपक ने जब दीदी की तबियत खराब देखी तो पिता पर जोर डालने लगे की उसी डॉ0 को दिखायें जहाँ पहले इलाज से वह ठीक हो गयी थी | इस बात के लिए उन्होने माँ व पिताजी को अच्छी तरह समझा दिया वह भी राजी हो गये क्योकि पहले भी  जीया दीदी की तबियत सही हुई थी अब रवीश ने नयी बात की कि वह वहां न जाये इस बात के लिए कोई भी तैयार न हुआ | बीमार दीदी को भी दीपक व रीया के साथ वापस उसी शहर में जाना पडा रवीश की एक न चली ...वह मन मनोस कर घर पर वही रह गया उसे दीपक के हथकंडे अच्छी तरह समझ आते थे साथ ही उसकी चालाकियां भी और वह दिखावा भी जो वह दिखाता था कि उसे परिवार की कितनी परवाह है ...उन्होने दुनियां देखी थी लेकिन परिवार के आगे बेबस हो चले अपने गुस्से का इजहार उन्होने साथ न जाकर किया |
खाली घर में नौकर व पिताजी के साथ वह अकेले थे अबकी सासु मां भी उन सबके साथ थी उनका पुराना नौकर कालू रवीश के पास आकर बोला , “ बाबुजी आपकों जीया बिटियां के साथ जाना चाहिए था ”..
“ क्यों कालू ? सासु मां और बच्चे तो साथ गये है न ! ? ”
“ हाँ वह तो ठीक है पर जीया बिटियां बहुत ही बीमार रहती है | एक बार आप भी जाते तो डॉ0 से समझ लेते उ को कौन बीमारी है ? ”
तुम सही कह रहे हो कालू लेकिन मै दीपक की कही हुई जगह पर नही जाना चाहता  था | मैने जीया के लिए बहुत ही बडे डॉ0 से बात की थी लेकिन मेरी नही सुनी मेरी गैरहाजिर में
इसने जरा क्या ध्यान रखा खुद को बडा हीरों बन रहा है , जबरन मेरे परिवार का सदस्य बन बैठा | ”
“ जी बाऊ जी आप सही कहे रहे ई दीपक बाबू पता नही कहाँ घुमे रहे कौन कौन अजीब अजीब आदमी के मिले रहे है ई ई  की नीयत ठीक नही |”
“रवीश बेटा , ”  …
“ हाँ पिताजी …”  ससुर की पुकार सुन रवीश उनके पास चले गये | कालू ने अपना गमझा उठाया और घर की साफ-सफाई में जुट गया |

इस  बार जीया और सभी लोग घर वापस तो आ गये लेकिन जीया की तबियत में खास फर्क नही पडा , रवीश पहले ही नाराज थे पर पत्नी की हालत देख उन्होने कुछ नही कहा एक बात उन्हे दुख पहुंचा रही थी नन्नू व रिन्कू उनकी बात कम और मौसा की बात को ज्यादा मानने लगे  थे इस वजह से दीपक उनकी माजाक उडाता .. “ बडा काबिल बनता है बच्चे तो कहना नही मानते ”.. गुस्से में रवीश ने नन्नू पर सख्ती बरतने शुरू कर दी वह धीरे-धीरे बडा हो रहा था इन सभी कारणों से उसने घर में सभी लोगो से दूरी बनानी शुरू की और अपने दोस्त निशान्त के साथ समय बिताने लगा वह उसके साथ स्कूल में था , पढाई का बहाना बना नन्नू उसी के घर में ज्यादा समय बिताता |
जीया का बेटा उससे दूर हो रहा था वह और भी दुखी रहती रवीश ने अपनी फैक्ट्री के सभी विदेशी प्रोजेक्ट रद्द कर दिये उसका ध्यान जीया की तरफ लगा रहता  , वह चाहते थे कि जीया खुश रहे |
जीया और रवीश के घर फिर से नया मेहमान आने वाला था ….ऐसे कमजोर शरीर में प्रेगनेंसी...डॉ0 ने कहा कि वह चाहे तो इस बच्चे को गिरा सकती है क्योकि उनके पहले ही दो बच्चे है लेकिन जीया न मानी उसने कहा कि वह उसे जन्म देगी ….बच्चे अपनी दूनियां में मग्न रहते ! जीया के पास  काम से ही आते ..दीपक अपने रंग ढंग सबको देखा चुका था बडे दामाद को वह फूटी आँख न भाता लेकिन रीया व बच्चे की वजह से सभी उसे बरदाश्त करते | रीया ने उससे शादी कर पूरे परिवार को गहन पीडा में पहुंचा दिया था जिससे बाहर आना किसी के बसे में न रहा बस समय अपनी रफ्तार से भागा चला जा रहा था उस पर  किस का जोर चला है !
जीया ने अपने तीसरे बच्चे को जन्म दिया वह काफी मोटा व सुंदर था रिन्कू बहुत खुश थी ...उसे उसकी बहन मिल गयी |
नन्नू ने जब उस बच्ची को देखा तो माँ से गुस्सा हुआ कि उन्होने कभी नही बताया था पहले कि उसकी एक और बहन आने वाली है ...वह गुस्सा हो अपने दोस्त के घर चला गया | दोस्त की माँ ने उसे समझा बुझा कर घर वापस भेज दिया नन्नू ने खुशी खुशी अपनी नन्ही सी बहन को गोद में उठा लिया |
खुशी का माहौल था नानी व मौसी बात बनाने लगे जीया कि दो दो बेटी हो गयी इससे अच्छा तो एक लडका और हो जाता , रवीश उनसे नाराज हो गया और उसने अपनी बेटी को उन्हे छुने नही दिया वह जानते थे कि दीपक के रंग में सास और साली रंगे हुए है अब वह उनसे बात नही करते थे |
रवीश रात भर जग कर अपने छोटे से बच्चे की देखभाल करते ताकि पत्नी को तकलीफ न हो |
जैसे जैसे वक्त बीत रहा था घर  हालात सुधरने के बजाय
बिगडते ही गये नन्नू व रिन्कू अपनी बहन के साथ खेलते नये बच्चे के आने से पिता का ध्यान भी उसमें रहता इससे दीपक को काफी जलन होती उसका बच्चा पतला दुबला ही रहा जबकि जीया का बच्चा सुंदर व तंदुरूस्त रीया उसे देख जलने लगी उसे लगता दीदी ने दो बच्चों के बाद भी हमें जलाने के लिए डॉ0 के मना करने पर भी अपना एक और  बच्चा पैदा किया …! रीया व दीपक की जलन चरम सीमा पर जा पंहुची |
आये दिन दीपक रवीश से उलझने की कोशिश करता ...ससुर का पैसा बिजनेस करने के नाम पर डूबा दिया, बडे दामाद
रवीश से जलता व उसके बारे में झूठी बातें फैलाता घर का माहौल उसने बर्बाद कर दिया था ...यह सब देख पिता का ब्लडप्रेशर बढने लगा |
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 To be continue...
सुनीता शर्मा खत्री
© pic from goggle

Wednesday, June 27, 2018

पहली पत्नी

पहली पत्नी
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“ कैसी होगी वह सुंदर या मेरे जैसी साधारण निखिल बाबू को छोड क्यूं चली गयी सुना है जीवित है फिर उसने ऐसा काहे किया तुम्ही बताओं काहे चली गयी वो सुबह पौ फटने से पहले ही ..का खराबी रही ई ससुराल में कौनो कमी तो नाही ऐसा काहे किया ..तुम्ही बताओ ननदियां तोहार भैया को छोड काहे चली गयी ..अब कहाँ है ओ का कौन पता बताये दे तो पूछेगे ओ से काहे छोड दिया बाबू को तोको कितना चाहे रहे ...जबसे हमे ब्याहे के आये है एक भी दिन हमसे हंस के नाही बोले चौबीस घन्टा हमऊ में कमी नजर आती है ऊ का जब हम से प्रेम था ही नही तो काहे हमसे ब्याह कर लिए हमको यहां घुटन लगती है ऐसा लगता है हम किसी और का कछ् छीन लिए है नाही ननदियां अब नाही रह सकत|
 हम यहाँ , तुम हमही को घर, समाज ईज्जत की दुहाई देते हो, हमई को सब समझात हो , हमार मायके वाले भी उ की बात सुने है | ऐसे घर में नही रहना हमें जहां हमारी कोई इज़्ज़त नही तुम उसी को वापस ले आओ , तुहार भैया की खातिर ऊ की पहली पत्नी …. को हम कभी पहली नही बन सकते चाहे हम कितनी भी कोशिश कर ले |”

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चित्र गुगल से साभार
सुनीता शर्मा खत्री
©

Monday, May 28, 2018

फिल्म


फिल्म
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'क्या मस्त फिल्म थी रे ..बहुत मजा आया देख के ! तेरा मन नई करता ऐसा करने का...! ' "क्यों नही करता अभी कौन छोकरी देगा कोई काम धन्धा तो है नही फिल्म भी तेरे पैसे से देखी दोस्त हो तो तेरा जैसा ही ही ही .....!"
'अरे घनचक्कर चल कही हाथ साफ करते है बिलकुल फिल्म की माफिक ऐश करेगा अपुन दोनो बोल क्या करेगा ...क्यो नही दोस्त के लिए तो जान भी हाजिर तो फिर चल  कल दोपहर नयी बिल्डिंग के पास में आना , वहाँ काम चल रहा है '...नशा सर चढ बोल रहा था |
"हाय दैया!  हमार छोकरियां का क्या हाल कर डाले इसको सुला कर हम रेता ढोने गये रहे अब आकर देखा है मार डाला हाय करमजले कौन किये यह सब ..."! फर्श पर लहु फैला था |
'ई को अस्पताल ले चलों' ..."अब क्या ले जाऊंगा ई तो मर गयी है ..."
माँ दहाडे मार रो रही थी भीड में सबके आंसु निकल रहे थे |
अखबारों , टी.वी चैनल अपना रैग अलाप रहे थे ...पाँच साल की बच्ची के साथ रेप , दरिन्दों ने मासूम का मुंह बन्द कर गला घोंट के मार डाला |
बोतल एक तरफ लुढकी पढी थी ...दो नशेडी नशे में उन्नींदे बुदबुदा रहे थे ..."बिलकुल फिल्म की माफिक किया मजा आई गया |"
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सुनीता शर्मा खत्री
©

Thursday, May 3, 2018

पश्चाताप की ज्वाला

पश्चाताप की ज्वाला 

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( कहानी , भाग-1)

‘ रीया रीया’ ...माँ ने पूरा घर छान लिया,  छोटी बेटी का कही अता-पता नही , कहाँ गयी है किसी को कुछ पता नही  माँ बडी बेटी के कमरे में आती है जो बच्चों को खाना खिला रही थी ..."जीया तुमने रीया को देखा कही गयी है  ? नही  क्या? तुम्हे बता के नही गयी  , नही माँ मुझे नही पता मै तो बच्चों के कामों में व्यस्त थी | आ जायेगी अपनी किसी सहेली के घर गयी होगी | तभी नन्नू भागा भागा गया बैठक से एक पत्र लेकर आया माँ को थमा दिया ,
"यह क्या है ? किसका खत है ,"
"मौसी ने दिया था सुबह और कहा था जब सब मेरे बारे में पूछेगे तब देना ".."अरी जल्द पढ जीया "...माँ के होश उड रहे थे , "क्या लिखा है इसमें !!"
जीया ने खत पढा और वही पडे सोफे पर निढाल हो गिर पडी | "क्या हुआ तू बताती क्यो नही माँ चीख रही थी माँ को ऐसे देख जीया ने बताया कि रीया ने दीपक से शादी कर ली है और वह उसके साथ उसके घर जा रही है तुम कभी उसकी शादी दीपक से नही करते इसलिए दोनों ने चुचचाप कोर्ट मैरिज कर ली है अगर वह उसको खुश देखना चाहते है तो कोई बवाल न करना  |
वह उसके साथ बहुत खुश है |" 

छोटी बहन घर से चली गयी अपने प्रेमी के साथ माँ ने अपने को बचाने के लिए  इल्जाम बडी बहन पर लगा दिया कि उसी ने उसे घर से भगा दिया ताकि पूरे घर में आराम से रह सके क्योकि वह पिता की लाडली थी और उनका कोई पुत्र भी न था जबकि बडी बहन अपने बच्चों में व छोटी बहन में भेद न करती थी जितना प्यार वह अपने बच्चों से करती थी उतना ही अपनी छोटी बहन से भी करती लेकिन छोटी बहन , बडी बहन की परवाह न कर मौज मस्ती में रहती उसने घर से जाने से पूर्व अपनी बहन-जीजा माँ व पिता के बारे एक पल भी न सोचा कि उसके इस तरह जाने से सब पर क्या फर्क पडेगा |
थोडे दिन  तक माँ रोती कलपती घुमती रही फिर चुप रहने लगी पिता की इज्जत पर जो बट्टा लगा उसकी वजह से उन्होने घर से निकलना छोड दिया , बडी बहन ने बिस्तर पकड लिया | इन सबसे परे छोटी बहन अपने प्रेमी के साथ ब्याह कर आराम से ससुराल में थी |
एक दिन रीया के पति को पता चलता है वह गर्भवती है तो तो वह उससे कहता  है कि अपने पिता को इसके बारे में बता दो |
"नही नही मै नही बता सकती वह मुझे कभी माफ न करेगे  हमने उन्हे बिना बतायें विवाह किया अब मेरा रिश्ता नाता सब उनसे टूट चुका , मेरे हर बंधन अापसे जुडा है "
"वह तुम्हारे पिता है जब उन्हे पता चलेगा कि तुम पेट से हो तो वह में स्वीकार कर लेगें , रीया चुप हो गयी और कुछ सोचने लगी जब हम घर में बिना बतायें विवाह कर रहे थे तब तो एक बार भी नही कहाँ कि अपने पिता को बता दो अब जब खुद के पिता बनने की बारी आयी तो कहते है अपने पिता को बता दो , क्या बताऊ क्या वह यह न कहेंगे कि मेरी अनुमति ले थी जब चुपके चुपके ब्याह किया तब क्यों न बताया |
उसको  यह लगने लगा कि दीपक अब बदल गया है बार बार मुझ पर घर में बात करने का दबाव बनाता है यदि ऐसा था तो घर से बिना बताये विवाह क्यों किया | ऐसे ही रीया सोचती रहती | बहुत सोचने के बाद उसने अपनी बडी बहन को पत्र लिखा अपना हाल चाल बताया व अपनी गल्ती के लिए माफी माँगी कि उन्होने किसी बिना बताये विवाह किया क्योकि वह जानती थी पिताजी दीपक से ब्याह के लिए कभी राजी न होंगे क्योकि वह उनकी नजरों बेकार व आवारा है जो सिर्फ दौलत के लिए उससे प्यार करता है जबकि दीपक ने कभी उससे ऐसी बात न की न ही कभी उसे पैसों के लिए तंग किया जबकि अपने ब्याह का सारा खर्च भी उसने खुद ही उठाया , वह अपने पति के साथ बहुत खुश है उसे उन सबकी बहुत याद आती है |
‎रीया ने पत्र में अपनी दीदी को कहा कि वह पिताजी से बात करे और उन दोनों को माफ कर दे क्योकि वह अब माँ बनने वाली है |
बडी बहन जब रीया का पत्र मिला तो वह बीमार थी बच्चों ने चुपके माँ को पत्र पढाया उसकी कुशलता के बारे में पता चलने पर वह खुश हो जाती है , छोटी बहन के माँ बनने की खबर दीदी के चेहरे को खुशियों से भर देते है वह माँ को बताती है कि वह परेशान न हो उनकी छोटी बेटी खुश है दीपक बहुत अच्छा है उसका बहुत ध्यान रखता है |
वक्त हर घाव को भर देता है  |  दीदी -जीजा  व माँ खुश लेकिन पिता ने इस बात को स्वीकार न किया कि छोटी बेटी ने घर में बिना बताये विवाह किया उन्होने रीया माफ न किया .......
दीदी ने रीया पत्र लिख अपनी कुशलता लिखी साथ उसे बधाई दी उन्होने कहा वह उससे नाराज नही है लेकिन वह एक बार अपने बारे में बता देती तो ज्यादा अच्छा रहता इस तरह घर से जा कर  बिना बताये शादी करना ठीक नही इससे सबका दिल टूटा है छोटी व लाडली होने के कारण पिताजी का अरमान था काफी धुमधाम से ब्याह करवाने का किन्तु अब क्या हो सकता है | रीया अपना ख्याल रखना  घर में माँ बच्चे तुम्हे बहुत याद करते है |
रीया को जब दीदी का पत्र मिली तो वह खुश हो गयी चलो घर में दाखिल होने का रास्ता तो मिला उसने दीपक को बताया वह मन ही मन मुस्कुरा उठा पर जाहिर न होने दिया |
जब रीया का बेटा हुआ तो उसने दीदी को दुबारा खत लिखा कि वह मौसी बन गयी है | दीदी को जह यह खबर मिली तो खुशी के मारे झुम उठी , बच्चे भी बहुत खुश हुए उनका भाई आया है | यह क्या!! नियति तो हंस रही धीरे धीरे , दीदी के ऊपर ....
रीया की बडी बहन जीया ने पूरे घर में लड्डू बाँटे , "मै मौसी बन गयी , मै मौसी बन गयी "......, रीया उनकी एकमात्र बहन थी , बच्चे छोटे थे दिल का  हाल उनसे कहती, " नन्नू , तू अब तू बडा भाई बन गया तेरा छोटा भाई आ चुका है , " पति उसे देख हंसता उसे बस इस बात की खुशी थी उसकी पत्नी जो इतने दिन से बिस्तर पकडे थे बहन की खुशी में उठ खडी हुई |
रीया के ससुराल वाले भी बहुत प्रसन्न हुए बहु ने पोता जो जना था वह था भी बहुत सुंदर माँ की तरह | दीपक ने रीया को अपनी बातों के जाल में फंसाना शुरू किया ..." मुझे लग रहा है यहाँ तुम्हारी ठीक से देखभाल हो रही रीया तुम्हारा फूल सा चेहरा मुरझा रहा है , यह मुन्ना भी बहुत कमजोर है |
तुम अपनी दीदी से कहो अपने पास बुला ले वहाँ तुम्हारी अच्छी देखभाल होगी नानी है , मौसी है वह अच्छे से तुम्हारा ध्यान रखेगे , यहाँ तुम दोनो को  कौन संभाले |"
रीया दीपक जैसे पति को पा निहाल थी उसे लगा उसे उसकी कितनी फ्रिक है , उसके फरेब को वह न पहचान पा रही थी |
रीया ने दीदी से पत्र में मिन्नत की कि वह उसे अपने पास बुला ले ससुराल में उसकी व मुन्ना की देखभाल करने के लिए कोई नही है दीपक सुबह ही काम के लिए निकल जाते है बाकी सदस्य भी नौकरी पेशा है , सभी सुबह से शाम तक घर  बाहर होते है जिससे अकेले छोटे बच्चे के साथ उसे बहुत सी परेशाानियां होती है | माँ जब मुन्ना को देखेगी तो उनकी नाराजगी भी दूर हो जायेगी पिताजी से बात कर लो उसे लेने आ जाये उसे माफ कर दे , हाँ और नन्नू को भी साथ लाना वह भी अपने छोटे भाई को देखेगा तो बहुत खुश होगा |
दीदी को जब पता चला कि उनकी बहन तकलीफ में है उनसे रहा न गया उन्होने पिताजी को कहा कि रीया को यहाँ घर ले आवे पिताजी ने साफ मना किया जो मेरी इज्जत की परवाह किये बगैर घर से भाग कर शादी की है ऐसी लडकी की वह शक्ल भी देखना पसन्द नही करते लाना तो बहुत दूर की बात है |
दीदी ने भी जिद पकड ली खाना पीना छोड दिया अगर रीया को यहाँ नही लाओगे तो वह अन्न को हाथ भी न लगायेगी | छोटी बहन की तकलीफ ने उन्हे विचलित बना दिया,  पता नही कैसी होगी ?  कौन देखभाल करता होगा? मुन्ना को कौन संभालेगा ? बस उन्हे यही धुन सवार थी कैसे भी हो रीया को यही लाना है | पिताजी बेबस हो गये अब , मन मार के उन्होने रीया को घर लाने तैयारी शुरू कर दी |
दीदी काफी उत्साहित थी साथ ही बच्चे भी धमाचौकडी मचाये थे , एक नन्हा बच्चा उनकी मंडली में शामिल होने वाला था  |अब पूरे भाई -बहनों की संख्या तीन हो गयी | नन्नू बहुत खुश था सोचती कैसा होगा मेरा भाई | वह भी अपने नाना जी के साथ मौसी को लेने चल पडा |
नन्नू  ने जिद की कि वहअपने छोटे भाई के लिए खिलौने भी लेकर जायेगा सबने मना किया वह न माना अपने खिलौनों में से कुछ छोटे छोटे हाथी , घोडे और बॉल अपने बैग में रख लिए , वह पहली बार ट्रेन से जा रहा था पूरे घर में दौडता फिरता , "हम ट्रेन से जायेगे ! '  ट्रेन चली छुक छुक'.... गाना गाता , खुश होता !!
जब पिताजी व नन्नू रीया के घर पंहुचे तो वहाँ कोई न था रीया छोटे बच्चे के साथ अकेले थी उसका चेहरा मुरझा चुका था बच्चा भी बहुत कमजोर था | पिता ने जब यह देखा तो उनकी आँखे भर आयी रीया को वह इस हाल में देखेगे उन्होने कभी सोचा भी न था उन्हे गुस्सा भी बहुत था प्यार में अंधी ने ऐसा क्या देखा जो पिता की परवाह भी न की किन्तु जीया की खातिर उन्होने खुद को संभाल लिया  जीया ने घर से चलते समय उनसे कसम ली थी वहाँ जाकर गुस्सा न करना नही तो उसका अनशन न टूटेगा  | दोनो बेटियों में जमीन आसमान का अंतर था पिता इस बात को समझते थे |
रीया पिताजी व भांजे को देख खुश हो गयी जैसे जलते हुए रेगिस्तान में पानी का मश्क मिल गया हो | नन्नू ने छोटे बच्चे को देखा देखता रहा उसका सफेद चेहरा बडी बडी आँखे बिल्कुल मौसी की तरह लगता था मौसी मौसी करता नन्नू मौसी के गले लग गया | मौसी ने उसे अपने बेबी को दिखाया और कहाँ , "वह चाहे तो उसे गोद में ले सकता है" नन्नू ने उले गोद में उठा लिया वह रूई के फाहे के समान हल्की था अपनी बडी आँखों से वो बच्चा भी नन्नू को देखने लगा कहता हुआ मानो !
'कैसे हो बडे भैया ?'
मासूम नन्नू ने अपने खिलौने उसे दिखाये यह क्या वह जोर जोर से रोने लगा मौसी ने उसे अपने सीने से लगा लिया मेरा बच्चा !!
नन्नू चुपचाप देखता रहा उसे अजीब लग रहा था मौसी को मानों उसकी कुछ फिक्र ही नही थी उसे भुख लग रही थी उसे अहसास हुआ वह यहाँ बेकार ही आया | नाना ने इस बात को भांप लिया और उसे ले बाजार आ गये वहां उन्होने नन्नू को खाना खिलाया व खुद भी खाया | वही से छोटे बच्चे के लिए कपडे लिए फल मिठाई भी ली शाम हो चली थी वह वापस मौसी के घर पहुंचे दीपक भी तब तक घर आ चुका था उसने बढकर ससुर जी के पांव छुये |
उनके सख्त चेहरे को देख वह कुछ भी नही बोल सका अजीब सी खामोशी थी |
नन्नू और पिताजी रीया को लेकर अगले दिन वापस घर पंहुचे | रीया के छोटे से घर में एक रात बमुश्किल से काटी उसका बच्चा रात भर रोता रहा कोई ढंग से नही सो पाया | दीदी ने जब रीया को इतने समय के बाद देखा तो वह खुश हो गयाी लपक कर उसके बच्चे को गोद में ले लिया |
" ‎अरे!! यह तो बिल्कुल तुम्हारी तरह लगता है रीया तुम भी बचपन में ऐसी ही थी , माँ को दिखाते हुए बोली !  है न रीया जैसा " !
माँ को कुछ होश न था इतने दिन छोटी बेटी के वियोग ने उन्हे बावरा बना दिया था अब जब वह सामने थी तो उनके आँसु थमने के नाम न लेते थे |
"‎मेरी बेटी तू कहाँ चली गयी थी ," रीया भी माँ को देख रोने लगी दोनो माँ बेटी का मिलन हो रहा था उधर जीया उसके बच्चे को ले सारे घर में घुम रही थी पति भी खुश थे आखिरकार इतने दिनों के बाद घर में खुशी आयी वह रीया को अपनी साली कम बेटी अधिक मानते थे |
‎सबको खुश देख पिताजी ने चैन की सांस ली |
‎रीया के तबियत मायके आकर ठीक हो गयी यहाँ अच्छे से देखभाल जो हो रही थी बडे अमीर  बाप के घर में अभाव न था | वह खोयी खोयी रहती शायद उसे दीपक की याद सताती थी उस समय मोबाईल फोन  प्रचलन में नही थे , लैन्डलाईन फोन ही थे | कभी कभी दीपक से फोन पर बातें होती और उसके करीबी रिश्तेदार उस शहर में मौजूद थे जो दीपक के कहने पर वहाँ आने लगे घन्टों रीया से बातें करते माँ घर के कामों में , दीदी बच्चों में व्यस्त रहती अकेली रीया उनसे घुलने मिलने लगी |
‎धीरे -धीरे रीया ने अपनी जगह पिताजी की नजरों में बनानी शुरू की वह उनका पूरा ख्याल रखने लगी शायद उसके ऐसा करने से पिता का रूख उसकी ओर नरम हो उनकी नाराजगी दूर इसका वह जी जान से प्रयत्न करती उसकी कोशिशें रंग लाने लगी बुढा बाप,  बेटी व नन्हे नाती  के मोह में फंसता गया लेकिन नन्नू के प्रति उनके अनुराग में कमी न आयी वही उनका पहला नाती था | दो बेटि़यों के बाद जो पुत्र समान नाती उन्हे मिला था उसने पुत्र न होने के अभाव को खत्म किया था इसीलिए वह जहाँ भी जाते नन्नू सदैव उनके साथ होता था | रीया की कोशिशे होती नन्नू को उनसे दूर करने व अपने मुन्ना को उनके करीब करने की |
‎इन बातों से बेखबर जीया छोटी बहन को खुश जान , प्रसन्न रहती माँ तो अपना दुख भुल गयी और बहुत खुश रहती उन्हे एक नाती और मिल गया था इन सबमें लाडली बहन थी रिन्कू |
.....
दोनो बच्चे अपने बीच एक नन्हे बच्चे को देख बहुत खुश रहने लगे , नन्नू व रिन्कू दौड दौड कर मुन्ना के लिए चीजे लाते अपने खिलौने कपडे व दूसरा जरूरी समान सब अलमारी ले  बाहर निकाल ले आये  | रिन्कू जिद करती , " मुन्ना मेरे कपडे पहनेगा तो नन्नू कहता वो लडकी नही है लडका है बेवकूफ ! उदास रिन्कू मौसी से कहती कि वह लडकी क्यों नही लायी ", मौसी हँसती बच्चों की बातें सुन तब नानी बोली , "अगली बार रीया  उसके लिए बहन लायेगी" ...नानी की बात रिन्कू ने मान और माँ को बताने लगी , "माँ जब मौसी मेरे लिए बहन लायेगी तो मै अपने फ्रॉक उसको दे दूंगी |"
बच्चों के प्रेम को देख नाना-नानी व दीदी-जीजाजी हंसने लगे पर रीया अपने में खोयी रही दीदी ने उसकी उदासी को भांप लिया और दीपक को फोन किया कि वह भी यही आ जाये | दीपक को तो मानों मनचाहा वरदान मिल गया अगले ही दिन वह वहाँ आ धमका उसको आया देख पिताजी नाराज हुए लेकिन दीदी ने उन्हे समझा दिया कि माँ -बेटे उसे मिस करते है कुछ समय बाद तो वह रीया को अपने साथ ले ही जायेगा |
रीया बहुत खुश रहने लगी अब उसी घर में सब लोग थे माँ -पिता , दीदी-जीजा | घर में कोई कमी तो थी नही , बडा दमाद बहुत काबिल व अच्छी नौकरी में था विदेश से बुलावा आया काम के सिलसिलें तो वह मना नही कर पाये , इधर छोटा दमाद पंहुचा उधर बडा दमाद विदेश जाने की तैयारियों में  जुट  गया,  दीदी उदास दिख रही थी तो पति ने समझाया अब तो तुम्हारी बहन भी वापस यही आ गयी है कुछ समय की बात है | उन्हे बाहर जाना ही होगा |
To be continue....


सुनीता शर्मा खत्री

© 
कहानी का अंतिम भाग बहुत शीघ्र |

Saturday, March 3, 2018

मै कान्हा की जोगन

मै कान्हा की जोगन


**********************
जोगन के दिल में हहाकार मच गया छोटी बच्ची ने उसे आईना दिखाया हो मानों !!
वह लडखडाते कदमों से चली जा रही थी खामोशी से आज उसका गीत संगीत भी रो रहा था , भगवान तुम मेरे सामने क्यों नही हो कहां हो तुम !!
तुम्हारे लिए मैने घर छोडा माँ-बाप छोडे समाज को दरकिनार कर दिया | जोगन अंतद्धद से जुझ रही थी , चलते चलते अपने आश्रम में जा पंहुची , जहां कान्हा की  बडी सी मूरत मुस्कुरा रही थी !!
कान्हा !!
कहकर जोगन ने तंबूरे को एक किनारे रख दिया
और सर उनके चरणों  में सर रख रोती रही |
"कौन है निर्मला, " माताजी ने  निर्मला से पूछा
"नित्या है माई बहुत देर से रो रही है !"

"उसे मेरे पास भेजों "

नित्या.... माता जी बुला रही है , चलों!

नित्या किसी तरह उठ चल पडी माता जी की कमरे  में | जलते दीये से प्रकाशित कमरे में अजीब सी खामोशी थी और सकून भी |
नित्या माता जी के समीप ही जा बैठी !
"क्या हुआ नित्या तुम आज इतनी विचलित क्यों हो कुछ दिनों से देख रही हूं तुम बेकल दिखती हो क्या हुआ तुम्हे किसी ने कुछ कहा |"

"किसी ने कुछ नही कहां माई",

नित्या की आँख से आंसु झर रहे थे |

"तुम्हारा बरताव तो  कुछ अलग ही कथा कह रहा है |

प्रतीत होता है तुम्हारा ह्रदय किसी पीडा से गुजर रहा है इस माई से कुछ नही छिपा पाओगी |"
'क्या प्रभु की सेवा में , साधना में,  जीवन बिताना गलत है ??
नही!  आज यह प्रश्न क्यों नित्या ?
"जब तुम अपना घर बार मातापिता छोड हमारे पास आयी थी तो हमने तुम्हे हर बात से आगाह किया था |"
हमने यह भी महसुस किया है कि तुम भले ही संसार का त्याग कर अपनी इच्छा से प्रभु सेवा में आयी हो पर तुम्हारा मोह माया से पीछा नही छुटा तुम अभी भी अपने घर के चक्कर लगाती हो |
मुझे क्षमा  करे माता मै प्रभु भक्ति में ही लीन थी पर माया से वशीभुत मै तब हुई जब  वर्षों पहले मैने अनजाने में अपने घर के समीप गुजरते  वक्त एक नन्ही बच्ची को देखा अपने माता -पिता यानि मेरे  भाई-भाभी की गोद में खेल रही थी |
गुलाब के फूल की भांति  सुंदर,  उसका मुख देख मै अपने कान्हा को भी एक पल के लिए भुल गयी उस बच्ची से देखते ही अनुराग हो गया | कब वो देखते ही देखते बडी हो गयी , पता भी न चला वह भी मुझे देख खुश होती थी |
"आज उसने मुझे घृणा से वह शब्द कहे जिसने मेरी दुनियां ही हिल गयी है  "|
मैने जीवन में प्रभु को ही सबकुछ माना पर प्रभु ने मुझे माया में फंसा दिया मेरी जीवन नैय्या मझधार में है माता !! मै क्या करूं इतनी बेकल तो मै कभी न हुई कितनी बार लोगों के व्यंगों का सामना किया समाज से परे जा कर भी |

माता जी ने उसके सर पर हाथ फेरा व दिलासा दी इसमें अवश्य ही  प्रभु की कोई लीला ही होगी |
"अब तुम विश्राम करों हमारा संध्या का समय हो गया है |"
' जी, ' जोगन निश्चेष्ट चल दी अपने  कक्ष की ओर |
आरती वंदन के बाद नित्या सोने की कोशिश करने लगी पर नींद उससे कोसो दूर थी |
बरसों पुरानी घटनाएं चलचित्र की भांति चलने लगी |
बचपन में वह हूं ब हूं निम्मी की तरह ही दिखती थी , घर भर की लाडली नित्या दादी संग पूजा-पाठ में लीन रहती  थी |
दादी का अधिकतर समय पूजा घर में ही बीतता  था , घर में सुख था वैभव था पर फिर भी घुटन थी |
दादा दादी के साथ बुरा बरताव  करते थे , कारोबार में अग्रणी थे पर घर गृहस्थी में उनका मन न रमता था | घर से अक्सर बाहर आना जाना रहता घर की जिम्मेदारी उसके पिता के कन्धों पर थी साथ ही कारोेबार में भी वह दादाजी का हाथ बटाते थे |
पिता व दादा की तरफ से बे परवाह उसका भाई आशिक मिजाज निकला जिसके चर्चे आये दिन होते उस पर लगाम लगाई पिता ने सुंदर  व गुणी लडकी से ब्याह कर भाई को गृहस्थी के बंधन में बांध दिया |
दादी को लालसा रहती पौते को गोद में खिलाऊ पर भाभी की गोद सूनी रही |
इसी लालसा को लिए वह दूनियां से चल बसी |
मंदिर में कान्हा की सेवा में नित्या ने खुद को डूबों दिया |
भोगविलास उसे रास न आया |
नित्या  दादी के साथ अक्सर कृष्ण मंदिर जाया करती थी  , वही माता जी ने उन्हे अपने आश्रम में आने का निमंत्रण दिया फिर वह वहां भी आते जाते रहते |
‎प्रभु सेवा में लीन आश्रमवासियों को देख नित्या का मन बैरागी हो चला लेकिन वह कभी अपनी मंशा घर में बता नही पायी |
इसी बीच दादा जी भी चल बसे  ‎| नित्या के माता-पिता ने समय से एक अच्छा रिश्ता खोज उसकों भी गृहस्थ जीवन में रमाने को सोचा |
जब रिश्ता हो रहा था तो नित्या ने कुछ नही कहा बस चुप ही रही |
दादी के गुजर जाने के बाद भी वह कृष्ण मंदिर व आश्रम आती जाती रहती | एक दिन माता जी ने उसकी उदासी का कारण जानना चाहा  तब उसने अपनी संन्यास लेने की इच्छा जाहिर की माता जी ने उसकों घर में अपनी इस इच्छा के बारे में बताने को कहा तो नित्या डर गयी उसे पता था उसके माता-पिता इसके लिए कभी राजी न होंगे वह गृहस्थ जीवन का बहुत संजिदगी से पालन कर रहे थे  | वह उसकी एक न सुनेंगे |
नित़्या डर गयी उस लगा यदि वह घर में बतायेगी तो वह कभी कान्हा की सेवा में अपना जीवन नही बिता पायेगी जबरन उसे इन चीजों से दूर कर दिया जायेगा वह परिवार के लोगों का ठाकुरवादी रैवेया जानती थी जहां किसी स्त्री की  अपनी निजी जिन्दगी व भावना का कोई मोल न था वह क्या चाहती है इससे उन लोगों को कोई फर्क न पडने वाला था बल्कि वह उनके मुताबिक चले यह मायने रखता था  इसलिए वह विवाह तय होने पर भी चुप ही रही |
माता जी ने उसे कहा  था कि वह अपनी इस इच्छा घर में बता दे
लेकिन वह ऐसा न कर पायी और निर्मला दूसरी जोगन को बता शादी वाले दिन चुपचाप घर से निकल पडी |
माता जी उस वक्त आश्रम में नही तीर्थ यात्रा के लिए दूर जा चुकी थी |
निर्मला जोगन ने उसकी काफी मदद की और वह जोगन बन प्रभु साधना में लीन हो गयी |
वक्त बीतता गया जोग लिए बरसों बीत गये सब उस नित्या को भूल गये , नित्या भी भूल गयी खुद को |
प्रभ ने ऐसी  माया रची  की जिस घर में औलाद की खुशी को तरसते थे नित्या के भाई -भाभी की झोली हूं ब हूं नित्या जैसी लडकी  को डाल दिया |
जिसे परिवार के लोग भूलना चाहते थे वही नित्या सा रूप धर अपनी मोहक सूरत से परिवार में खुशियां बिखेरने लगी | उसकी
माँ ने उसका नाम निम्मी रखा पर वह नही चाहती थी  कि उस बुआ जोगन में पता चले इसलिए उन्होने कभी उसकी बुआ के बारे में नही बताया  जबकि वह जान चुकी थी कि नित्या ही  जोगन है |

जोगन बनी नित्या ने जब पहली बार उसे देखा था तो वह एक पल अपनी सुध ही भूल गयी मानों उसका बचपन उसके सामने वापस आ गया हो |
जिस मायामोह से दूर वह बैरागी हो चली थी निम्मी की भोली सूरत ने उसे मोह में डाल दिया था |

"नही !!यह फिर से न होगा मै भले ही जोगन बन गयी लेकिन निम्मी पर अपना साया न पडने दूंगी अब कभी उस गली से भी न गुजरूंगी |"
"निम्मी सही कहती है माता-पिता ही उसके भगवान है |

कान्हा ने मेरी भक्ति की  परीक्षा ली है शायद मोह किया उसी का दण्ड दिया  उन्होने मुझे  मै विचलित हो जाऊ ! नही !!
कान्हा प्रभु!! मेरा यह जीवन तुम्हारे लिए है |
मै तो अपने कान्हा की पूजारिन हूं विवश हूं !!
जोगन हूं मै !
अपने प्रभु कान्हा की जोगन !!"

##

सुनीता शर्मा खत्री
© 

चित्र गुगल से सभार



Monday, February 19, 2018

जोगन

जोगन

*****************
वो आ गयी ....जोगन आ गयी माँ ...दरवाजे पर खडी है  |"
"ले पकड और दे आ उसको "  निम्मी ने झट से दस का नोट पकडा और दरवाजे पर दौडती हुई जा पंहुची |
जोगन उसको बडी सुंदर लगती थी उसकी जटायें उसका गाना , मन में सोचती , यह कितना मीठा गाती है  , यह
जोगन क्यों है ?
इतनी सुदंर है फिर भी !
क्या इसकों कोई न मिला ब्याहने वाला सैकडों सवाल अलहड निम्मी के मन में आते रहते किससे जवाब माँगती माँ को पूछों तो डाँट देगी   | वह छुटपन से इसे देखती आ रही है | गेरूऐ रंग के लिबास में उसका चेहरा चमचम  चमकता रहता है |
निम्मी ने उसको दस रूपये पकडा दिए वह चली गयी ..साथ ही  चला गया उसका संगीत |
निम्मी एकटक देखती रही | वह ज्यों ज्यों बडी हो रही थी जोगन को देख  सोच में पड जाती एक लगाव सा हो गया था उससे | उसने भी ठान लिया अबकी वह आयेगी तो उससे पूछेगी चाहे जो हो माँ झट से आवाज दे देती है पहले से पैसे छुपा कर रखुगी ताकि माँ से न माँगने पडे जब जोगन को दे दूंगी तो साथ उसके बारे में भी पूछुगी ??
स्कूल से आते ही निम्मी ने माँ से पीछा ,
"माँ जोगन आयी थी , आज नही आयी , "
"कहां चली गयी ? "
"  कितनों दिनों से तो नही आयी "  तूझे क्या काम आन पडा जोगन से , नही आयी  ?? तूझे क्या ?? वह तो जोगन है  | इनका कोई एक ठिकाना तो होता नही गाते है  , घुमते है और  मांगते है |"
"ऐसे ही पूछ रही थी , वह गाती तो कितना अच्छा है न माँ |"
"हाँ  बिटियां , गाती तो बहुत ही बढिया है |
कही दूर निकल गयी होगी ,  माँगते माँगते , " |
माँ कही खो सी गयी |
.....
निम्मी यहां क्यो बैठी हो ??
" जोगन का इन्तजार कर रही हूं कब आयेगी वो , "
‎माँ ने जवाब न दिया भीतर चली गयी , तभी कानों में जानी पहचानी आवाज सुनाई देने लगी निम्मी चहक उठी जोगन आ गयी झटपट अपने बैग से दस का मुडा मोट निकाल ले आयी , आज तो उससे पूछेगी जरूर |
‎जोगन दरवाजे पर आ पंहुची गीत .....जारी था ...निम्मी को बाहर देख मुस्कायी थोडी देर बाद गाना खत्म हो गया उसने अपनी झोली निम्मी के आगे फैला दी निम्मी ने पैसे नही दिए जोगन निम्मी को सवालियां नजरों से देेखने लगी क्या मेरा गीत अच्छा नही लगा दूसरा सुना दू ?
‎निम्मी ने हिम्मत दिखाते हुए पूछा ... " तुम ऐसी क्यों हो ? तुम्हे डर नही लगता ? कहां घुमती हो ? बाकि औरतों की तरह घर में क्यो नही रहती ???"

‎एकसाथ इतने सारे सवाल जोगन देखती रही निम्मी को अपलक ...झोली समेट ली उसने और बिना जवाब दिए चल दी वहाँ से |
‎" ऐ.... सुनों तो  ! यह पैसे तो ले लो |"
 जोगन ने सुना पर अनसुना कर  दिया | गाना फिर भी गा रही थी ....जिसका दर्द निम्मी ने साफ पहचान लिया |
‎"  इसने तो कुछ बताया ही, नही कोई नही बताता |"
‎कुछ देर निम्मी सोचती रही फिर सहेलियों के साथ खेलने चली गयी वहां भी उसका मन न लगा |
‎.....
"इस लडकी को कोई काम धाम नही बस जोगन के बारे में ही सोचती रहती  है "माँ बोल रही थी , पापा से |
"तो तुम उसके बारे में बता क्यो नही देती "
"क्या बताऊ "
माँ स्वर तीखा हो गया, " जो जानती हो वही "
नही  मै नही जानती मै उसे निर्लज्ज को उसका नाम भी न लो अगर अबके यहां मांगने आयी तो डपट दुंगी ताकी दोबारा इस गली से गुजरना ही छोड दे जाये कही और अपना तान तंबूरा ले कर |
तुम्हारा क्या बिगाडती है ! बेचारी भगवान का भजन करती है मांग मांग कर गुजर बसर कर रही है , तुमसे यह भी न देखा जाता कैसे पत्थर हो गयी हो तुम !!
"हाँ ! मै पत्थर हो गयी हूं भगवान भी तो पत्थर का  है फिर काहे उसके गीत गाती फिरती है |"
तुम भुल गये उसके कारनामें ! मै नही भूल सकती जी को जलाने हमारे दरवाजे पर आती है , और मेरा मुंह न खुलवाओं तो बेहतर ही होगा कम से कम तुम्हारे लिए तो |"  फिर चुप्पी छा गयी , माँ की आवाज नही सुनाई दी  |

निम्मी बाहर गयी तो देखा न वहाँ न माँ थी , न पिताजी कहाँ गये दोनो ?
......" माँ माँ . ..."

"क्यो चिल्ला रही हो यही हूं ," कमरे से माँ की आवाज सुनाई दी  , माँ तुम पिताजी से गुस्सा क्यो हो कहां गयो वो मुझे नही पता वह  चिल्लायी निम्मी ने देखा माँ की आँखों में आंसु थे तुम क्यो रो रही हो क्या हुआ पापा ने कुछ कहा क्या ??

 माँ ने निम्मी को  भींच कर सीने से लगा लिया |......
…….

निम्मी ने माँ के आँसु पोछे  " माँ अगर तुम्हे बुरा लगता है तो मै कभी भी उसके बारे में नही पछूंगी | " माँ को दुखी देख निम्मी को बहुत दुख हुआ उसने फैसला किया वह कभी उसका जिक्र न करेगी न ही उसे भीख देने जायेगी |
कई दिन बीत गये जोगन भी नही आयी गाना गाने |
निम्मी सोचती जरूर पर कहती नही थी ताकि माँ को दुख न पंहुचे और घर में कलेश न हो |
दीवाली का दिन था निम्मी बहुत उत्साह में थी ढेर सारे पटाखे लायी थी... बाजार से जलाने को पापा से जिद कर  |
शाम को बहुत से मेहमान भी आये थे मौसी घर में रूकी थी बाकी सब चले गये अगले दिन |
मौसी निम्मी दोनो ने बहुत पटाखे जलाये ..बहुत मजा आया निम्मी बहुत खुश थी उस दिन ....तभी कानों में वही जाना पहचाना सा गीत संगीत गुंजने लगा ,  " कौन है  निम्मी ?? मौसी ने पूछा ? ' अरे कोई नही एक मांगने वाली है दरवाजे पर जाओ मौसी उसको पैसे दे आओ |'
"तुम भी चलो निम्मी दोनो उसे दीवाली का प्रसाद भी दे आते है |"
" न बाबा न मै नही जाती तुम्ही जाओ"  और निम्मी झटपट अपने कमरे में घुस गयी अजीब है मौसी को आश्चर्य हुआ " लाओ दीदी मै ही दे आती हूं |"
जोगन को देख वह हैरान हो गयी,  यह इस हाल में ये तो वही है जो बरसों पहले घर छोड गयी थी ठीक उस समय जब इसकी बारात आने वाली थी |
जोगन अपने गाने में मस्त थी अपनी झोली फैला भीख तो ले ली पर उसकी आँखे निम्मी बाँट जोह रही थी कुछ बजाती , गाती रही , रूकी रही फिर चली गयी |

"दीदी दीदी यह माँगने वाली तो वही है न जो...?"

माँ ने उसे इशारे से चुप करा दिया क्योकि निम्मी वहां थी |
‎ निम्मी ने उन पर ध्यान न दिया चुपचाप वहाँ से खिसक गयी छत से  जाती हुई जोगन को दूर से ही देखती रही |

जब वापस आयी तो माँ व मौसी आपस में बात कर रहे थे |

“‎यह जोगन बन कर घुम रही दीदी आपके आस-पास जब इसकी शादी कर रहे थे तो भाग गयी थी किस मिट्टी की बनी है यह स्त्री |”

‎माँ बहुत धीरे धीरे बोल रही थी , " हाँ यही से गुजरती है पहले पहले तो मै न पहचानी थी एक दिन पास से देखा तो पहचाना यह अपनी नित्या ही है जिसने अपनी  शादी छोड घर से चली गयी बहुत ढूंडा  हमने कही नही मिली लोगो ने पता नही क्या क्या बोला किसी के साथ भाग गयी होगी और भी इतना बुरा कि मै बता नही सकती पहले ही कह देती  तो  माँ बाऊ जी  रिश्ता ही क्यो करते  लडके वालों ने जो तमाशा किया जो बेईज्जती की हमारी उसे हम भूल नही सकते माँ बाऊ जी ? "
"‎ वो दोनो भी तो इसी गम व सदमे में दुनिया से चले गये इकलौती लडकी थी किसी चीज की कोई कमी न थी पर देखों इसका नसीब प्रेम करती है भगवान से इसी धुन में हमारा एक न सोचा  भगवान  की पूजा तो गृहस्थी में भी हो सके है |"
" ‎जो भी है दीदी अब तो यह सालों पुरानी बात हो गयी तब तो निम्मी भी नही थी पर अब जब उसे यह पता चलेगा यह उसकी सगी बुआ है फिर क्या होगा दीदी ??"

" ‎हां बात तो सही  है मै उससे कब तक छिपाऊं  उसके पापा कहते है बता दो , वो हमेशा पूछती है खुन को खुन जोर मारता है |"
‎मुझे तो लगता है वो इसे ही देखने आती है मै उसकी छाया भी न पडने दुंगी अपनी बच्ची पर |"

निम्मी ने जब यह सुना कि जोगन उसकी अपनी सगी बुआ है तो वह सन्न रह गयी |

निम्मी की आँखों से आँसू बह निकले वह रोते रोते वह माँ और मौसी दोनो के नजदीक जा पहुंची |

"निम्मी ! क्यो रो रही हो ?"

“माँ वो जोगन मेरी बुआ है न ??
 
‘दीदी तो इसने सब सुन लिया’

“  ‎खैर पता तो चलना ही  था |”

“मै कब तक छिपाती जब यही  माँगती फिरती है |”

इस जोगन ने  हमें कही का  नही रखा |  इससे अच्छा तो यह होता कही मर जाती या कही और अपनी भक्ति के गाने कही दूसरी जगह  गाती  | हमारा जीना तो दूभर किया ही था अब इस मासूम की जिन्दगी पर भी असर डालेगी !!"

माँ निम्मी को चुप कराने लगी , "चुप हो जा निम्मी तू तो मेरी रानी बिटियां है न |"
"हाँ माँ " , कहकर निम्मी माँ के सीने से जा लगी |
निम्मी का दिल टूट गया था जिस जोगन की वह राह तकती थी माँ से छिप छिप देखती थी उससे उसे घृणा हो चली थी |
अपने माता-पिता के प्रति उसका प्रेम पहले से  ज्यादा बढ गया उसने ठान लिया कि वह अपनी बुआ के जैसे माँ बाप को  कभी दुख न देगी |
साथ ही निम्मी ने ठान लिया था कि वह जोगन को सबक जरूर सिखायेगी |


निम्मी ने जोगन की सच्चाई जानने के बाद उसकी तरफ से ध्यान पूरी तरह से हटा दिया |

एक दिन निम्मी ने देखा जोगन घर के बाहर खडी गीत गा रही है निम्मी को उसे देख क्रोध आया पहले की तरह प्यार नही |
आज अच्छा मौका है निम्मी जल्दी से बाहर जा पंहुची ,  "ऐ जोगन यहां क्या शोर मचा रही हो जाओ कही ओर जाकर मांगों |"

जोगन ने जब निम्मी को यह कहते सुना तो  उसका चेहरा निस्तेज पड गया | वह चुपचाप वहां से चली गयी |
निम्मी को लगा  , अच्छा  हुआ पिंड छुटा इससे |
कुछ समय बाद जोगन  फिर दरवाजे पर खडी गाने गा रही थी ,

"प्रभु संग प्रीत लगाई मैने
की है उनसे सगाई ......!!!"

निम्मी ने जब उसका गाना सुना तो उसे गुस्सा आया जबकि पहले वह खुश हो उसका गाना सुनती और पैसे दे देती थी , निम्मी गुस्से से  दनदनाती हुई बाहर जा पंहुची , "तुम्हे कहा था न ,  यहाँ नही आना फिर आ गयी तुम ? "
 "क्या हुआ "? निम्मी माँ भी पीछे पीछे आ पंहुची ..
निम्मी फट पडी, " प्रभु संग प्रीत लगाई...! तुम्हारे माता-पिता , भाई-भाभी से प्रीत नही हुई तुम्हे !
माँ बाप भी भगवान होते है , हूं बडी जोगन बनती है भगवान की की भक्तिन "!!
जोगन की आँखे फटी रह गयी आँखों से आंसु टपकने लगे
अपनी झोली थाम निराश कदमों से लडखडाती हुई चली गयी |
उसके बाद फिर उस जगह कभी जोगन का गीत सुनाई न पडा |

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आगे की कहानी जोगन पार्ट -2सुनीता शर्मा खत्री
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Pic from goggle
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आखिर क्यों ??

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