Thursday, March 28, 2019

आखिर क्यों ??

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" क्या माँगती हो भगवान से पूजा पाठ कर ! " पूजा गृह से वापस लौटी सन्जना पर तंज कसता हुआ नवीन मुँह टेढा कर मुस्कुरा रहा था |
सन्जना उसका व्यंग्य समझ गयी लेकिन खामोशी से अपने काम में लग गयी | क्या कहती वह ! कुछ पल के लिए ही सही मंदिर में भगवान की मूरत देख वह अपना हर दर्द भुल जाती फिर हिम्मत जुटा अपने दिन की शुरूवात करती | उसकी खामोशी देख नवीन तिलमिला गया वह उसे बर्दाश्त नही कर पा कर पा रहा था कोई न कोई बहाना खोजता उससे लडने का हर दिन काम में मीन मेख निकालता ताकि उसे घर से और अपनी जिन्दगी से निकाल फेंके लेकिन उसकी हर चाल उल्टी पडती घर वालों ने उसे सर चढा रखा था  | नवीन कोशिश करता कि सब उससे नफरत करे लेकिन वह अपनी इन कोशिशों में विफल रहा |
रात दिन उसके दिमाग में यह जदोजह्द चलती रहती कैसे अपने और पालुमी के रास्तें की सन्जना रूपी दीवार को गिरायें उसे कामयाबी नही मिल पा रही थी , उसकी हर चाल उल्टी पडती ..दिन पर दिन उसकी झुंछलाहट बढती गयी |

लैपटॉप पर पालुमी से वीडियों चैट करते नवीन की सारी रात बीत गयी दोनो की नजदीकियाँ बढती ही जा रही थी | दोनो के शहरों में दूरियाँ बहुत थी लेकिन नेट ने इनकी दूरियों को कम किया था |

"वह इतनी आसानी से तुम्हारा पीछा नही छोडेगी आखिर क्या कमी है उसे अपने घर जाकर भी रह सकती है जब तुम उसे पंसद नही करते तो  तुम्हारी जिन्दगी में चली क्यों नही जाती |"

'तुम शांत हो जाओ पालोमी मै कोई न कोई रास्ता जरूर निकाल लूंगा अपनी जिन्दगी से तो क्या इसे दुनियां से ही मिटा दूंगा बडी सती सावित्री बनती है क्या मै नही जानता जब मै बाहर टूर पर जाता था तो क्या गुल खिलाती थी | जब से तुम मेरी लाईफ में आयी हो पालुमी मै जीने लगा हूँ वरना तो मेरे स्वार्थी परिवार वालों ने मेरा जीना हराम किया हुआ था बस हर वक्त पैसा चाहिए इन्हे , मेरी कोई परवाह नही !
मतलबी है सबके सब | "

लैपटॉप की स्क्रीन पर पर पालुमी अपनी कातिलाना
मुस्कान फेकती है अपने निवस्त्र शरीर पर हाथ फेरती हुई कहती , " मै तो कब की तुम्हारी हूँ पर तुम्ही ने देर की हुई है | " उसकी आदाओं से नवीन पागल हुआ जाता है, " तुम फ्रिक न करो मै जल्द ही इसे घर से निकाल दूंगा फिर उसके बाद तुम यहाँ होगी मेरे इस घर में इस कमरे में इस बिस्तर पर हमेशा के लिए |"

' ठीक है अब मै सोने रही हूँ तुम भी सो जाओ कल फिर मिलेगे | ' पालुमी ने अपना पुरा हुस्न नवीन के सामने परोस दिया जिसे संवारने के लिए नवीन अच्छी खासी रकम उसके बैंक एकाउन्ट में जमा करता था जब भी मौका मिलता उससे मिलने पहुंच जाता |
....

आभागी सन्जना इस बात को अच्छे से समझ चुकी थी कि उसका पति उसका है ही नही लेकिन परिवार वालों की मान मर्यादा के चलते वह खामोश रहती कहती भी तो किससे अपनी बीमारी से लाचार उसके सुंदर चेहरा कुम्हला गया था उस पर बच्चों का पालन पोषण और परिवार जनों की सेवा में खुद को समर्पित कर वह ससुराल में तो सम्मान पा चुकी थी लेकिन पति की चाहतों के आगे उसकी एक न चल पायी उसकी जली कटी सुनना और मार खाना यही उसने अपनी नियति मान हालातों से समझौता किया हुआ था |

...

बेटी को ट्यूशन से घर वापस लेकर  लौटी सन्जना पर नवीन बहाना बनाता हुआ भडकने लगा ..." कहाँ गयी थी हीरोईन बन कर अपने यारों से मिलने "....
सन्जना ने कोई जवाब न दिया वह समझ चुकी थी नवीन फिर उससे लडने के मूड में है सारी उसने लैपटॉप पर गुजारी है यह उसका कमरा देख सुबह ही समझ गयी थी लेकिन उससे उलझने वक्त बर्बाद न कर घर के काम में लग गयी ...नवीन पर तो पालुमी के ईश्क और हुस्न का नशा चढा था  | किसी  भी तरह सन्जना खुद ही से  घर चली जाये या खुद उससे तलाक ले ले, इसके लिए आज फिर वह उसे उकसाना चाहता थी बिना वजह  अनाप शनाप शब्दों की बौछारें करने लगा | " रन्डी जवाब नही दे रही " और सन्जना को बालों को जोर से पकड खींच घर के बाहर ले आया ..".साली बार बार पूछ रहा हूँ कहाँ गयी थी बता नही रही बहुत ऐंठ आ गयी है "...बेटी भागते हुए बाहर आयी पापा मम्मा को क्यों मार रहे हो वह तो मुझे लेने गयी थी और जोर से रोने लगी बेटी को रोता देख नवीन कुछ होश में आया ..."मै पूछ रहा हूँ जवाब नही दे रही रही इसलिए मारा इसे हरामखोर को | "

कहता हुआ नवीन घुमने चला गया |

"मम्मा आपने पापा को बताया क्यों नही क्यों मार खायी अगर मै बता देती तो वह तब भी मारते बेटा |"
वह बच्चों से क्या कहती उनका पिता क्या कर रहा है  अपना  दर्द भुल सन्जना ने बेटी  के आँसु पूछ सीने से लगा लिया बच्ची रोते रोते कहने लगी ...." मम्मा आप यहाँ से दूर चलों हम यह घर छोड कर चले जायेगे | पापा गन्दे है |"
' ऐसे नही कहते बेटे '! सन्जना ने जब पिता के प्रति बच्ची के मन में नफरत का भाव देखा तो वह सोच में पड गयी आखिर क्यों नवीन ऐसा  क्यों करता है लैपटॉप पर सारी रात क्या करता है ... बच्चों के कोमल मन पर कितना गहरा  बुरा असर पड रहा होगा सोच कर वह सहम गयी साथ ही कुछ फैसला लेने के लिए सोचने लगी |
 अपनी सारी हिम्मत जुटा सन्जना चुपचाप नवीन के कमरे में गयी और उसका लैपटॉप खोल देखने लगी आखिर वह क्या करता है जैसे ही उसने गुगल हिस्ट्री चेक की तो जो कुछ उसे दिखा उसके होश उड गये
 नवीन इस हद तक गिरेगा वह कभी सोच भी नही सकती थी तभी वह उसके साथ ऐसा बर्ताव करता है अपनी हवस के लिए वह एक बजारू औरत को घर में रखने को तैयार हो गया |
 उसने ठान लिया कि वह अब और बर्दाश्त नही करेगी क्रोध से उसका र्सवांग काँप रहा था |
 उसने घर में सबकों बताया और अपना फैसला भी
 सभी सकतें में थे | काम करने के बहाने कई कई दिनों तक घर से बाहर रह नवीन यह गुल खिला रहा था सबके सर शर्म से झुक गये |
 नवीन की माँ गु्स्से से भर गयी , " आज इसे आने दो बहु पर तोहमते लगाता है खुद क्या कर रहा है यह पूरा घर बर्बाद कर  दिया इसने |"
तभी देवेन भागा हुआ आता है ..."माँ  ! भाभी जल्दी चलों! "
क्या हुआ देवेन ! "माँ भैया का एक्सीडेन्ट हो गया  उन्हे हॉस्पिट्ल में ले गये है | मै बाजार में था मुझे मेरे दोस्तों ने बताया जल्दी चलों"
 सन्जना भी अपना गुस्सा भुल गयी, " क्या ! भैया ! जल्दी चलों |"


सब हॉस्पिटल पँहुचते है वहाँ बेड पर खुन से लथपथ नवीन पडा था बेहोश माँ जोर से चिल्लायी , "  यह क्या हो गया ! " वह लगभग बेहोश होने को थी सन्जना की भी रूलाई फुट पडी नवीन को इस हाल में नही देख सकती थी भले ही उसने उस पर कितने भी जुल्म किये हो |     

डॉ0 ने बतलाया की  एक्सीडेन्ट में गंभीर  चोटे आयी है उन्हे सर्जरी करनी होगी , अधिक देर नही कर सकते वरना नवीन की जान पर खतरा हो सकता है काफी खुन बह चुका है उसे ऑपरेशन थियेटर ले गये |

नवीन का भाई रो रहा था उसने ही बताया कि भैया बहुत तेज गाडी चला रहे थे उन्होने बहुत ड्रिंक की हुई थी नशे में वह खुद और गाडी को संभाल नही पाये तेज गति से  सामने से आ रहा ट्रक उनकी गाडी जा टकरायी उसकी स्पीड इतनी तेज थी पूरी गाडी चकनाचूर हो गयी बडी मुश्किल से लोगो ने गाडी से बाहर निकाला |

"तुम चुप हो जाओ  देवेन सन्जना ने ढांढस बंधाया तुम्हारे भैया ठीक हो जायेगे कुछ नही होगा उन्हे |"

" तुम ठीक कहती हो बहु बुरा ही सही बेटा है वो मेरा उसको ऐसे हाल में नही देख सकते है!" बेबसी उनके चेहरे से साफ झलक रही थी दोनो हाथों कों जोड भगवान से प्रार्थना करनी लगी ,"  हे भगवान उसके गुनाहों को माफ कर दे ! "

तभी ऑपरेशन थियेटर से  एक डॉक्टर बाहर आता है सभी उसकी तरफ बढते है , " कैसा है मेरा बच्चा माँजी ने  डॉ0 पूछा , " थोडी देर हो गयी यहाँ लाने में मरीज की दोनो टांग काटनी पडेगी नही तो बचाया नही जा सकता एक्सीडेन्ड में पूरी तरह से कुचल गयी है  ! "
क्या ! माँ यह सुनते ही बेहोश हो गयी देवेन ने उन्हे संभाला भाभी,  पापा  आप यही रहो मै माँ को घर छोड कर आता हूँ इन्हे यहाँ रखना ठीक नही है |"
" तुम जाओ मै देख लूंगी!" सन्जना ने खुद को संभालते हुए कहा |
" क्या करना है आप अपना निर्णय जल्द बताये"

"आप पापा जी से पुछ लीजिए"!

 सन्जना ने ससुर की ओर इशारा करते हुए कहा उसकी रूलाई फूट पडी ससुर ने कहा , " खुद को संभालो सन्जना,  होनी को कौन टाल सकता है |"

'आप वही कीजिए जो उचित हो डॉक्टर , '

'ठीक आप यहाँ साईन कर दीजिए |'

नवीन के पिता ने बुझे मन से साईन तो कर दिया पर दुख का पहाड जो उनके परिवार पर टूट पडा था,  उसे उन्होने समझ लिया था | वह बच्चों के आगे कमजोर नही पडना चाहते थे इसलिए अपने आँसुओं  को अपने अन्दर जज्ब कर गये और अस्पताल में रखे सोफे पर निढाल पड गये | सन्जना समझ नही पा रही थी कि क्या करे |

....

ऑपरेशन हो चुका था नवीन बेहोश था उसकों दुसरे रूम में शिफ्ट कर दिया गया | सिर्फ एक ही व्यक्ति रूम में रहे डॉक्टरस ने बोल दिया था सन्जना रो रही थी ससुर ने सांत्वना दी ,

"चुप हो जाओ बेटा होनी पर किसका बस चला है भगवान की शुक्र मनाओ वह जीवित तो है वर्ना तो जिस तरह उसका एक्सीडेन्ट हुआ था उसे  देख वह  जिन्दा भी बच भी पाया यही गनीमत समझों मै तुमसे क्या कहुँ उस नालायक ने जो सलुक तुम्हारे साथ किया आज तक उसी का फल मिला है उसे  | अब अपाहिज की जिन्दगी जीयेगा |"

सन्जना ने अपने ससुर का चेहरा देखा वह गुस्से और नफरत के साथ साथ दयनीय स्थिति में थे |
सन्जना ने कहा , "ऐसी बात नही है  पापाजी बस वह भटके हुए है वर्ना पहले उनका व्यवहार मेरे प्रति ऐसा न था |"

" यह तो सही कह रही हो बहु तुम नवीन पहले ऐसा न था उसकी बुरी संगति ने ही उसे इस हाल में पहुँचाया है ईश्वर उसे अब सही राह दिखाये |"

तभी देवेन के साथ नवीन के दोनो बच्चे भी आ पहुँचे

" पापा कैसे है मम्मा बताओं न |"

'ठीक है बेटा '

दोनो वही माँ के साथ बैठ गये , ' देवेन तुम यही रूकों,  भाभी के पास मै जरा घर जाकर तुम्हारी माँ को देख आता हूँ ! अब वह कैसी है

"वह ठीक है पापा उनका वी,पी लो हो गया साथ आने की जिद कर रही थी पर मै नही लाया | ठीक किया आखिर माँ ही तो  है वह अपने बेटे को इस हाल में कैसे देख सकती है |"

सन्जना के ससुर घर जाते वहाँ पूजा घर में पत्नी को बैठा देख वही चले जाते है ! वह अधीर हो उठती है " कैसा है नवीन बताओं और रोने लगती है वह उसे सीने लगा खुद भी रोने लगते है नवीन की माँ ..हमारा बच्चा अपाहिज हो गया मना करता था ! "बहु के साथ प्यार से रहा कर पर नही माना पता कैसा भुत सवार था उस पर हर समय गुस्से में रहता  था |

यह सब उस औरत की वजह से हुआ जिसके चगुंल में वह फंसा था घर में बहु थी बच्चे थी पूरा परिवार था लेकिन उसे हमसे कोई खुशी कहाँ थी तुम ठीक कहती हो नवीन की माँ अगर वो यहाँ खुश होता तो ऐसे चक्करों में न पडता अब क्या अपने लायक भी न बचा | "

"बेचारी बहु अभी भी उसके साथ खडी उसी के लिए रो रही है |"

उस बेचारी की क्या गलती वह वही करती है जो उसे करना चाहिए जलील तो नवीन ही है |"

'ऐसे मत बोलो नवीन के पिता उसे उसके किये की सजा मिल गयी |'

उस बजारू को घर ला रहा था अब ले आ अब आ जायेगी आपाहिज के साथ कर लेगी इसकी सेवा उसी को बुलाओ  आँख तो खुलेगी , जो करेगा वही करेगा हम क्या करे बुढापे में यह दुख देखने को मिल रहा है  | अच्छी खासी बहु है उसके साथ खुश नही रह सका नालायक! "

 कहते हुए नवीन के पिता सुबकने दोनो पति पत्नी गम में डूब चुके थे  | मंदिर में कृष्ण भगवान मन्द मन्द मुस्कुरा रहे थे |

वहाँ आभागी सन्जना बच्चों को अपनी बातों बहला कर उन्हे बहका रही थी ताकि अपने पापा का हालत देख वह घबराये नही |
....

नवीन हॉस्पिटल के कमरे में बेड पर बेहोश था उसे अभी तक होश नही आया था सन्जना ने चेकअप करने आये डॉक्टर से पूछा इन्हे कब तक होश आयेगा डॉक्टर्रस ने कहा कल तक होश आ जायेगा |
बच्चों ने पापा को कमरे में बेहोश देखा तो वह मायूस हो गये उन्हे यह नही पता था कि पापा  दोनो पैर एक्सीडेन्ट में गंवा चुके है न ही किसी ने बताया | उनके मायूस चेहरों को देख सन्जना ने उन्हे देवेन के साथ घर भेज दिया  और वहाँ लाने के लिए मना कर दिया ताकि उनके दिमाग पर बुरा असर न पडे |

थोडी देर में सन्जना के ससुर गोपालदास भी वहाँ आ पहुंचे . ..."तुम खाना खा लो बहु कल से तुमने कुछ नही खाया ! " सन्जना रोने लगी..." मत रो बेटी सब ठीक हो जायेगा | "उन्होने ढांढस बंधाया और अपने आँसुओं को पी गये |

" पानी .....पानी ...आह आह ....सुबह सुबह नवीन की आवाज सुन पास में रखे स्टूल पर औधीं पडी सन्जना के कानों में जैसे ही पँहुची वह हडबडा गयी दो दिन बाद नवीन ने आँखे खोली सामने सन्जना को देख चीखने लगा , ," तू मेरे सामने से हट जा ...आ गयी मेरे सामने  ! हट यहाँ से , मै कहाँ हूं ....! "तभी गोपालदास वहाँ आ जाते है नवीन को पकडते है, " खुद को संभालों बेटा ! नवीन उठने की कोशिश करता है लेकिन उठ नही पाता ! क्या हुआ मुझे ? मै कहाँ हूँ " और ...चीखता हुआ अपने पैरों पर ढकी हुई चादर हटा देता है दोनो पैर नदारद सिर्फ दोनो घुटनों पर पट्टीयाँ बंधी थी नवीन यह देख!  " मेरे पाँव...
" क्या हुआ मेरे साथ " कहता हुआ दोबारा बेहोश हो जाता है |

डॉक्टर आते है उसे इन्जेक्शन लगाते है वह फिर होश में आता है सुबकने लगता है गोपालदास उसे सर पर हाथ फेरते है वह उनसे लिपट जाता आँसुओं का दरिया बह निकलता है ...माँ भी पहुँचती है ! " नवीन मेरे बच्चें मत रो" ...माँ मेरे पाँव!
" .. मत रो बेटा जो हो गया सो हो गया तू बच गया यह क्या कम है !"
तभी सन्जना कहती है.." माँ जी दवाई का टाईम हो गया" ! वह दवा ले नवीन के पास आती है वह उसका हाथ छिटक देता है, " यह सब इस मनहुस की वजह से हुआ हट जा मेरे सामने से मै तेरी सूरत भी नही देखना चाहता |" सन्जना सहम जाती है और चुपचाप बिना कुछ कहे कमरे से बाहर निकल जाती है | बाहर बैन्च पर बैठती है  उसकी रूलाई नही रूकती तभी नर्स वहाँ पहुंचती है उसे रोता देख पूछती है कि क्या हुआ , " आपके पति है न वह जिनका परसों एक्सीडेन्ड के बाद ऑपरेशन हुआ था | " सन्जना सर हिला देती है उसका मन किसी से बात करने को नही था | " आप बाहर क्यों बैठे हो  अन्दर चले जाओं आपके पति है वो आपकों उनके पास होना चाहिए उन्हे दवा दे दी थी |"

सन्जना चुप रहती है नर्स ने कहा , " ठीक है वही दे देगी |"

"आपने अपनी दवाई ली"

 नवीन चुप रहा माँ बोली बेटा, " मुझे बता दे कौन सी दवाई देनी है !

 "मैने इनकी पत्नी को सब बता दिया था वह बाहर क्यों बैठी है  उनकों बुलाओं , माँ उसे अन्दर ले आती है | नर्स के सामने नवीन चुप रहा चुपचाप दवा ले ली |
 वह सन्जना को नफरत से देख रहा था |

बहु तुम घर चली जाओं वहाँ बच्चे अकेले है देवेन को भेज देना | सन्जना घर आती दोनो बच्चें अपनी माँ से लिपट जाते है , " मम्मा पापा कब आयेगे वह ठीक हो गये न हाँ बेटा ठीक हो गये जल्द ही हम उन्हे यहाँ ले आयेगे |"

सन्जना बच्चों के सामने अपने को कमजोर नही दिखाना चाहती थी  इसलिए समान्य बनी रही |

उधर नवीन की हालत सुधर रही थी वह बैठने लगा था डाक्टर्स ने जल्द ही डिस्चार्ज के लिए बोल दिया |

....

"तू ...जो मेरा न हुआ ....किसी का नही .... "!

देवेन गाना गा रहा था सन्जना उसके पास पहुँची,  " क्या गा रहे हो देवेन भैया ! कुछ नही भाभी भैया की वजह से परेशान था उन्होने आपके साथ कितना गलत किया न अगर वह आपकों नापंसद करने लगे थे तो तलाक ले लेते इस तरह आप पर जुल्म तो न  करते आपकों जगह जगह  बदनाम तो न करते ऐसा कर उन्हे क़्या मिला ...अब क्या करेगी उनका! वो क्या ऐसे इन्सान को पंसद करेगी जिसके दोनो पाँव कट चुके हो अब तो उन्हे व्हील चेयर पर आना होगा |

सन्जना उदास हो गयी अचानक ही क्या हो गया
अब क्या होगा ! नवीन उस पर और जुल्म करेगा ऐसी हालत में वह कोई फैसला भी नही ले सकती अपनी जिन्दगी का न ही इस हाल में वह नवीन को छोड सकती है उसका मन घबरानें लगा |
" क्या करू भगवान यह सब क्या हो गया देवेन से अपने आँसु छिपा कर मंदिर में चली गयी और दोनो हाथ जोड दिए मूरत के आगे , "हे कान्हा जी यह कैसा इम्तहान है |"
उसका पति जो उससे इतनी नफरत करता है अब तो वह उससे और भी नफरत करेगा |
तभी देवेन वहाँ आया!" अरे भाभी आप अभी तक यही हो वहाँ अस्पताल से माँ का फोन आ रहा है वह आप को बुला रही है !
"मै क्या करूँगी?
  तुम्हारे भैया मुझे देखते ही गुस्सा हो जाते है मै उनकी तकलीफों को और नही बढाना चाहती|"
  "अच्छा मै माँ से पूछ लेता हूँ |"
 माँ भाभी कह रही है कि वह वही बच्चों के पास है ,
 अरे बहु को ले आ मुझे इतना पता नही है सारा सामान दवाईयाँ वही तो संभालती है मुझसे नही होगा बेटा नवीन कुछ नही कहेगा |
सन्जना जाने को तैयार हो जाती है तभी उसे कुछ याद आता है ! " भैया आप गाडी बाहर निकालों मै अभी आती हूँ |"

हॉस्पिटल में माँ काफी परेशान हो रही थी नवीन को संभाल नही पा रही थी गोपालदास हॉस्पिटल से डिस्चार्ज पेपर ले रहे थे | सन्जना और देवेन भी वहाँ आ पहुंचते है आते ही सन्जना ने सब संभाल लिया नवीन खामोश था वह बेबस हो चुका था अब वह एक कदम भी बिना सहारे के कही आ जा नही सकता था | तभी व्हील चेयर ले वार्ड ब्वाय आ पहुंचा
, सबकी आँखे नम थी | सन्जना सारा समान गाडी में रखवा दिया नवीन हाईपर न हो जाये इसके लिए वह उससे दुर ही रही | देवेन और गोपालदास ने नवीन को व्हीलचेयर पर बैठा दिया नवीन पूरी तरह चुप था |
सन्जना ने मंदिर से लाया हुआ प्रसाद माँ जी हाथों में रख दिया माँ जी नवीन को खिलाने की कोशिश की "ले बेटा प्रसाद खा ले "! उसने गुस्से से माँ का हाथ छटक दिया उस बेशर्म औरत को बोलो मेरे पैर कटने की खुशियाँ मना रही है | अब तो बहुत खुश हो रही होगी रन्डी | साली बदजात तेरा बदला पूरा हो गया अब तो खुश है न तू !  इतनी जोर से चीखा
हॉस्पिटल के लोग अचरज से देखने लगे कितना बदतमीज आदमी है अपनी बीवी से कोई ऐसे बात करता है | वहाँ खडी एक औरत ने कहा तो माँ बोली

" उसकी तबियत ठीक नही है अभी इतने बडे ट्रामा से गुजरा है |"

"नवीन चुप हो जा  बेटा यहाँ तमाशा न कर घर चल"! गोपालदास ने कहा |


सन्जना बेटा तुमने नवीन का कमरा ठीक कर दिया था न  | माँ जी ने सन्जना से पूछा , "जी माँ सब ठीक करके ही आयी थी |"
नवीन अपने कमरे में शिफ्ट हो चुका था सभी उसकी तीमारदारी में लगे थे | व्हील चेयर पर बैठा नवीन खिडकी  से बाहर झांक रहा था  | वह बेहद मायुस था जो वह चाह रहा था पूरा नही हो सका वक्त की मार से बेबस हो चला था |

"मुझे बिस्तर पर लेटा दो देवेन , "

उसने अपने भाई से कहा देवेन ने व्हीलचेयर से उठा बिस्तर पर लेटा दिया अपने बडे भाई को, " आप थोडी देर आराम करो भाई मै जरा अभी आता हूँ!"

"राजू को आपके पास भेज देता हूँ ! "

"रूकों देवेन एक मिनट मेरा लैपटॉप दे दो जरा और हाँ मेरे लिए दूसरा मोबाईल ले आना पुराना तो एक्सीडेन्ट में डैमेज हो गया |  "

"भैया अभी आप आराम करों लैपटॉप बाद में चेक कर लेना |"

" छोटे तुझे जो कहा,  वो कर "

मैने कहा न लैपटॉप दे !

" जी भैया देता हूँ " कहता हुआ देवेन
लैपटॉप नवीन को थमा कमरे से बाहर चला गया |

नवीन की बैचेनी पालुमी से बात करने की जिसे
 वह जाहिर नही कर पा रहा था उससे बात करे कई महीने हो चले थे न जाने वह किस हाल में होगी यह जानने वह बेकल था न जाने वह उसके बारे में क्या सोच रही होगी | नवीन ने लैपटॉप आन किया पालुमी के  मैसेज,  वीडियो काल्स की बाढ आयी हुई थी उसने जल्द ही उसे वीडियों काल की और अपने बारे में  बताया , "ओह पालोमी मै तुमसे मिलने नही आ सकता लेकिन मै मरा भी नही हूँ  |"
"यह सब कैसे हो गया "...उसी मनहूस की वजह से "उसी की हाय लग गयी!"  मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था !
" मै जैसे  ही उसकी शक्ल देखता हूँ मुझे गुस्सा आने लगता है यह क्यो है काश उसकी जगह तुम यहाँ होती उस दिन गुस्सें में मैने बहुत पी ली थी न जाने कैसे ट्रक से टकरा गया कुछ पता नही पालुमी मै तो तुम्हारे नशे में था |

अच्छा !

पालुमी ने अपनी आदायें दिखानी जारी रखी!" मै कब से तुम्हे देखने को परेशान था मेरे घर वाले मुझे छोड ही नही रहे थे मेरा मोबाईल डैमेज हो गया है जल्द ही तुम्हे कॉल करूगा | एक काम करों तुम्ही यहाँ आ जाओ अब तुम्हे यहाँ आने से कोई नही रोकेगा | "
 "ठीक है मै आती हूँ लेकिन कैसे इतनी दुर आने के लिए मेरे पास अभी मनी नही है तुमने कितने दिनों के बाद मुझे कानटेक्ट किया |"
"  ठीक है मै तुम्हारी फलाईट की टिकट बुक कराता हूँ और तुम्हारे एकाउन्ट में मनी ट्रांसफर करवाता हूँ |"
"  ठीक है मै आती हूँ तुम्हारे पास फिर तुम्हारी उस मनहूस की कैसे छुट्टी करती हूँ तुम देखना |"

" मुझे उस दिन का इन्तजार है मै उसे और देर बरदाश्त नही कर सकता लेकिन बच्चों को मनाना होगा वह बच्चों को तो कलेजे से लगाये रहती है  इतनी आसानी से नही जायेगी |"
 
"यह तुम देखों मै या वह दो में से एक चुन लो |"

" तुम ! चुन लिया अब तो खुश हो हाँ हाँ हाँ..." नवीन जोरो से हँसने लगा |

नवीन सोचने लगा पालुमी को बुला तो लुंगा लेकिन घर वालों को कैसे तैयार करू अब उसके पास जाना भी मुमकिन नही है |

तभी सन्जना कमरे में चाय लेकर दाखिल होती है नवीन का मुंह बन गया अभी बताता हूँ इस को मन ही मन कुछ सोचने लगा जैसे सन्जना ने चाय उसे पकडाने की कोशिश की उसने कप को पकड जोर से दीवार पर दे मारा ! " यह चाय है साली इतनी गन्दी बनायी है "!और जोर जोर से गालियां देने लगा सभी कमरे में चले आते है !
"माँ कैसे चाय बनाई इसने "
"अरे हमने भी तो पी ठीक ही तो है |"

"तुम्ही इसे सर पर रखों मुझे मार दो जान से यह मुझे मार देगी माँ आह मेरे पैर !
 बेटे की तकलीफ में माँ को भी पीडा हुई |
 "सन्जना तुम जाओं यहाँ से"! सन्जना मौके की नजाकत भाँपते हुए चुपचाप चली जाती है |
" माँ तुम क्यो नही समझती मुझे तकलीफ में देख तुम्हे अच्छा लगता है क्या ? जो बार बार इसे भेजते हो मेरे पास | अच्छा तो तू क्या चाहता है मै क्या करूँ मेरा पीछा छोडवा दो प्लीज मै और बरदाश्त नही कर सकता |"
" ठीक है बेटा मै उससे तुम्हारा कोई काम नही करवाऊंगी | बच्चों को मेरे पास भेज दो | ठीक है बेटा , "

"बुढापे में यह दिन देखने पड रहे है ..."माँ बुदबुदा रही थी | उन्होने बच्चों को नवीन के पास भेज दिया |

...

नवीन बच्चों से बात करता है कि वह उससे कितना प्यार करते है  दोनो बच्चे अपने पापा पर चिपक जाते है और रोने लगते है !
 नवीन बच्चों की मासूमियत का फायदा उठाता है और उन्हे बताता है पालुमी उनकी दोस्त उनसे मिलने आ रही है और वह अब रहेगी उसी घर में !
 बच्चे कुछ नही कहते चुपचाप कमरे से चले जाते है और जाकर दादी को बताते है दादी खामोश रहती है और बच्चों को समझाती है करने दो उसकों जो करना है खुश रहने दो |
 वह सन्जना को समझाती है उसे आने देते बहु उसे खुश रहने दो हमने अपनी दिल पर पत्थर रख लिया है | सन्जना चुप थी वह घर के हालातों के आगे बेबस  थी अपनी जिन्दगी का फैसला करने जा रही थी लेकिन हालात ऐसे बन गये कि वह मझधार में थी उसके जीवन की डगमगा रही थी |अभी तक तो वह यही सहन करती रबी उसका पति निर्दयी है ....लेकिन अब सौत को भी अपने सामने कैसे बरदाश्त करे !
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नवीन बच्चों से बात करता है कि वह उससे कितना प्यार करते है  , दोनो बच्चे अपने पापा पर चिपक जाते है और रोने लगते है !
 नवीन बच्चों की मासूमियत का फायदा उठाता है और उन्हे बताता है पालुमी उनकी दोस्त उनसे मिलने आ रही है और वह अब रहेगी उसी घर में !
 बच्चे कुछ नही कहते चुपचाप कमरे से चले जाते है और जाकर दादी को बताते है दादी खामोश रहती है और बच्चों को समझाती है करने दो उसकों जो करना है खुश रहने दो |
 वह सन्जना को समझाती है उसे आने देते बहु उसे खुश रहने दो हमने अपनी दिल पर पत्थर रख लिया है | सन्जना चुप थी वह घर के हालातों के आगे बेबस  थी अपनी जिन्दगी का फैसला करने जा रही थी लेकिन हालात ऐसे बन गये कि वह मझधार में थी उसके जीवन की नैया डगमगा रही थी | अभी तक तो वह यही सहन करती रही उसका पति निर्दयी है ....लेकिन अब सौत को भी अपने सामने कैसे बरदाश्त करेगी उसकी आँखों के आगे अंधेरा आ
रहा था वह जाकर मंदिर में रोने लगी |
सन्जना के अन्दर हिम्मत न थी कि वह सौतन को देख सके | जब वह घर में आ पहुंची तो सन्जना अपने कमरे से बाहर नही निकली , आँसुओं के सिवा उसके पास कुछ न था बच्चे सब समझ रहे थे लेकिन अपने पिता का हाल देख उनकी खुशी के लिए खामोश थे |

पालुमी के घर में आने से नवीन के चेहरे पर रौनक आ गयी जिससे वह छिप छिप कर मिलता था लैपटॉप से मुलाकातें करता था अब वह उसके सामने थी |

वह नवीन के कमरे में पहुंची ... और कहती है , "अब मै  आ गयी हूँ सब ठीक हो जायेगा | " उसके शरीर से खुशबु की तेज गन्ध आ रही थी ...तन दमक रहा था और चेहरा चमक रहा था |

हरे रंग के लिबास में उसकी खुबसुरती निखर रही थी नवीन के माँ -बाप ने जब उसे देखा तो शर्म से उनका चेहरा झुक गया उनके बेटे ने उन्हे कही का नही छोडा सन्जना के घर वालों को जब पता चलेगा तो क्या होगा गोपालदास ने अपनी पत्नी दीपाली से कहा कि वह बहु से कहे के कुछ समय के लिए अपने बच्चों को लेकर  मायके चली जाये ...देवेन उसे छोड आयेगा |

वह सन्जना को बोलने गयी लेकिन सन्जना ने मना कर दिया कि अगर उनके माता-पिता को जब पता चलेगा कि नवीन का एक्सीडेन्ट हो गया है और वह ऐसी हालत में अपने पति की देखभाल न कर मायके आ पहुंची है तो उन्हे दुख होगा इससे बेहतर होगा कि उन्हे कुछ पता ही न चले | नवीन की माँ दीपाली ने "सर पकड लिया जैसी तुम्हारी इच्छा बहु बाद में हमें कुछ न कहना |"

 पालुमी नवीन के साथ बातें करती रही हंसती रही कोई उनके कमरे में नही गया किसी ने बात नही की देवेन घर से बाहर चला गया उससे यह सब नही देखा जा रहा था |

 बैठे बैठे नवीन थक गया तो पालुमी से कहा कि उसे लेटा दे पालुमी ने उसकी लेटने में मदद की वह नवीन से बात तो कर रही थी लेकिन उसे कुछ चुभ रहा था वह सोच रही थी इसी कमरे से नवीन उससे बात करता था जब उसने उसके कटे हुए पांव देखे तो डर गयी | उसने मन ही मन सोचा कैसे अपाहिज हो गया यह इसकी पत्नी कही नजर नही आ रही उसने नवीन से पूछा , "तुम्हारी पत्नी कहा नजर नही आ रही है यहाँ नही है क्या ?"

"क्या पालुमी तुमने किस मनहुस का नाम ले लिया यही कही होगी |"

"तुम्हे उससे क्या अब तुम्ही मेरा काम करोगी उसे यहाँ नही आने देना | " वह अचकचा गयी ...'ठीक है' पालुमी उससे अब तक बाहर ही मिली थी घर में उसका रूप एकदम अलग था |
....





तक पालुमी नवीन के कमरे में रहती  है , वहाँ कोई नही आता न बच्चे न भाई न माता पिता और सन्जना ने तो मानो खुद को कैद ही कर लिया हो  लेकिन एक दिन जब सन्जना रसोई में काम कर रही थी तो पालुमी वहाँ पहुंच गयी उसने चुपके से देखा सन्जना को वह एक खुबसुरत भरी पूरी औरत थी उसकी ममतामयी रूप देख पालुमी सिहर गयी उसकी अंतरआत्मा चीत्कार उठी यह वह क्या कर रही है देवी समान  स्त्री के सुहाग पर डाका डाल दिया  | नवीन का भयानक रूप देख वह समझ गयी यह इन्सान ही सही नही है तभी तो पूरा परिवार होते हुए इतनी सुंदर सुशील पत्नी के होते हुए मुझ जैसी औरत के पीछे तबाह हो गया | यह उसकी हवस है और कुछ नही उसका पति इतना गलत कर रहा है भगवान ने सजा भी दे दी फिर भी मुझे यहाँ बुला कर एक घरेलु स्त्री की तरह बर्ताव करने की उम्मीद कर रहा है , इतना सुंदर शरीर वह इस अपाहिज की देख रेख में बर्बाद नही कर  सकती उसके रूप रंग के बहुत कद्रदान है  |
जिस तरह नवीन उसे अपनी पत्नी के बारे में बताता रहा उससे तो लगता था कि वह कोई बेवकूफ सी औरत है लेकिन यहाँ तो कहानी ही उलट है इस परिवार की रीड तो यही है नही नही... मुझे अपाहिज नही बनना! नही छीनना इसका सुहाग ! लेकिन इस खुदगर्ज आदमी को रास्ते पर लाना ही होगा |
 उसने मन ही मन कुछ ठान लिया |

नवीन को बहुत तेज प्यास लग रही थी ...पालुमी बाहर टहल रही थी उसे यहाँ आये दो दिन हो चुके थे उसकी आँखों ने बहुत कुछ भांप लिया ....
तभी नवीन उसे आवाज लगाता है ....' पालुमी ' वह वापस नवीन के कमरे में जाती है उस वक्त वह कयामत ढा रही थी उसकी बडी बडी सुंदर आँखे चमक रही थी |

'क्या है  '

वह लगभग चिल्लाई उसके तेवर देख नवीन रूआंसा हो गया  , "कुछ नही ..पानी दे सकती हो!" नवीन ने कहा , "यह लो और उसने गिलास पकडा दिया |

"तुम यहाँ आओ मेरे पास किसी ने तुम्हे कुछ कहा क्या मेरे घर वालो ने या फिर उस मनहुस ने |"

पालुमी चुप रही नवीन को लगा उसके घर वालो ने कुछ कहा होगा अच्छा कही बाहर चलते है मै ड्राईवर को बोलता हूँ गाडी निकाले बच्चों को भी ले चलते है , पालुमी बोली नही , 'पहले हम चलते है बच्चों को बाद में ले चलेगे |'
'ठीक है ' वह अपनी व्हील चेयर पर बैठता है पालुमी उसकी मदद करती है ड्राईवर ने पूछा कहा चलना है,  "वही चलो उसी रेस्ट्रोरेन्ट में जहाँ मै जाता हुँ !
'ठीक है |'

पालुमी और नवीन कॉफी पीते है नवीन का दोस्त  तभी  खन्ना वहाँ पहुंचता है और पालुमी जैसे हुस्न को देख रूकता है नवीन से हालचाल पूछता है व इशारा कराे है कि कौन है नवीन कहता वह उसकी दोस्त है उसके एक्सीडेन्ट के बारे में सुन उससे मिलने आयी है | खन्ना वही बैठ जाता है वह काफी हैडसम था पालुमी की नजरें बार बार उस पर ठहर जाती वह भी उसे ताड रहा था ..नजरों के जाम आपस में टकराने लगे नवीन सब देख रहा था उसे गुस्सा आ गया पर चुप रहा ..." चलो पालुमी घर ..."
" अरे थोडी देर रूकते है न कितना अच्छा म्यूजिक चल रहा है "....यह है रेशमी जुल्फों का अन्धेरा न घबराईये .... हुस्न और जवानी आमने सामने थे बीच में वह अपाहिज!
 कुदरत भी खुल कर हँस रही थी  तभी तेज बारिश होने लगी खन्ना ने नवीन की व्हील चेयर पर बिठा कर अन्दर बिठा दिया पालुमी ने कहा कि जब बारिश रूक जायेगी तब चलेगे |

नवीन को एक कोने में बिठा कर खन्ना और पालुमी हाथ पकड कर बाहर चले गयी थोडी देर में वापस आये! , " मैडम को वॉशरूम जाना था अब तुम तो ले जा नही सकते थे  तो मै ही ले गया | "
"अब मै चलता हूँ किसी चीज की जरूरत हो तो मुझे फोन करना जहाँ जाना होगा मै ले जाऊगा ! " वह अजीब ढंग से हँस रहा था आदमी की फितरत आदमी न समझे यह हो ही नही सकता | बेबस नवीन चुप रहा  बार में दो तीन पैग लगा लिए उसने पालुमी "बोली चलो अब चलते है,  बारिश रूक गयी थी खन्ना उसे हाथ हिला कर बॉय कह रहा था | नवीन ने पालुमी को देखा उसकी आँखों में शरारत थी |
जब दोनो वापस घर पहुँचे तो बच्चे बाहर खेल रहे थे दोनो ने अपने पापा को देखा तो लपक कर उनके पास पहुँच गये ! "पापा हमारे लिए क्या लाये आप आन्टी को लेकर गये घुमने हमे नही ले गये ...!"

ऐ ! तुम दोनो !
" जाओ यहाँ देख नही रहे तुम्हारे पापा थके हुए है चलो जाओ यहाँ से ",
दोनो अपने पिता को देखने लगे नवीन चुप रहा उसके दिल में चुभन हुई उसके बच्चों को पालुमी ने ऐसे बोला उसे पंसद नही आया लेकिन  वह थक गया था आराम करना चाहता था इसलिए चुप रहा दोनो बच्चे चुपचाप अपनी माँ के कमरे में भाग गये |

पालुमी ने अपनी आदायें दिखानी शुरू की ... " बहुत थक गये न डार्लिंग चलो खाना खा लो मै लेकर आती हूँ ! "
पालुमी रसोई में गयी वहाँ कुछ खाने को न मिला वह नवीन की माँ दीपाली पास जाती है | उसे देख उन्होने मुंह घुमा लिया | पालुमी मन मार कर वापस नवीन के पास आती है और नवीन से पूछती है खाना कैसे खायेगे वहाँ कुछ नही नवीन माँ को बुलाता है माँ उसे लताडती है वह गुस्से से लाल पीली हो जाती है "जिसके साथ घुमने गया था उसी से अपना खाना बनवा ले |"

नवीन पालुमी का चेहरा देखता है , " न बाबा न मुझे खाना बनाना नही आता " हालाँकि पालुमी को सब आता था लेकिन वह नवीन को सबक सिखाना चाहती थी |

नवीन होटल से खाना मंगवाता है फिर दोनो कमरे में बैठ कर खाते है होटल का खाना खा कर नवीन बीमार हो जाता है | माँ ने साफ मना कर दिया उनसे काम नही होगा नवीन परेशान हो जाता है उसे लगता है पालुमी को घर में बुला कर उसने आफत मोल ले ली है और वह खन्ना भी बहुत बेतकुलफ हो रहा था
तभी उसे खन्ना आता हुआ दिखायी दिया कैसे हो दोस्त तुम्हारी दोस्त कहा है , " वह यहाँ नही है ."..नवीन कहता है तब तक पालुमी भी वहाँ धमकती है खन्ना उसे देख खुश हो जाता है पालुमी उसका हाथ  पकड   अपना आंचल लहराती हुई घुमने निकल जाती है | नवीन गुस्से से दांत भीचता है उसे विश्वास नही होता की पालुमी जो उससे इतना प्यार करती है इतनी दुर उसके पास रहने आयी यहाँ आकर वह यह करेगी |
आज से छोडुगा नही इसे यहाँ से वापस भेजूंगा |

तभी बच्चे खेलते हुए वहाँ आ धमके ! " पापा हमारे साथ खेलो वह कहता है ,  हाँ चलो खेलते है" और बच्चों के साथ खेलने लग जाता है | उसे अपने पुराने दिन याद आते है जब वह पालुमी से नही मिला था पूरे परिवार के साथ हँसता खेलता था उसे जोरो की भुख लग रही थी वह मायूस हो बैठा था तो बेटी पूछती है |" क्या हुआ पापा आपकी तबियत खराब है?" वह कहता है वह ठीक है उसे भुख लगी है , बस इतनी सी बात अभी मम्मा को बोलती हूँ वह आपके लिए कुछ बनाये |

सन्जनी ने खाना बनाया हालांकि उसे बहुत जोर से बुखार था लेकिन वह नवीन को परेशान नही देख सकती थी उसे बच्चों ने सब बता दिया |
खाना खाने के बाद नवीन ने बच्चों से पूछा कि उनकी माँ कहाँ है तभी बेटी बोल पडी मम्मा को बुखार है पापा उन्होने कुछ नही खाया "
क्या ?

नवीन के दिल में कुछ चुभ रहा था |

शाम को पालुमी वापस आयी तो नवीन उस पर बरस पडा , "तुम यहाँ मेरे ले आयी हो या खन्ना के लिए वह मुझ से ज्यादा हैडसम है क्या ? नवीन उसे बोलता है और गुस्से में  बोलता ही गया है तो तू वेश्या ही पैसा भरो तो तू बात करेगी , पैसा दो तो मिलने आयेगी तू कैसे मेरे साथ इस घर में रहेगी , मेरा काम कैसे करेगी तुझे तो बिस्तर चाहिए मर्द चाहिए तूझे अब वो मिल गया |"

पालुमी ने एक थप्पड उसके गाल पर जड दिया ,

"साले अपाहिज कही के तू होता कौन है मुझे बोलने वाला तेरी बीवी नही हूँ जो तेरी बकवास सुन लुंगी |"
तेरी हिम्मत कैसी हुई मुझे बोलने की तेरी सेवा कर अपनी जवानी बर्बाद करू तुझमें अब रखा ही क्या है तूने पैसा दिया तो ब्याज समेत वसुला भी अपना शरीर नोचवा कर तेरी हवस भी तो पूरी की मै कोई घर की औरत नही जो शरीर भी दुंगी और बदले में कुछ भी न लुंगी |"

नवीन उसके तेवर देख बौखला गया उसे उम्मीद नही थी पालोमी उसके साथ ऐसा करेगी |

वह उसे वहाँ से चले जाने को बोलता है पालुमी गुस्से से बोलती है," तेरे संग रहेगा भी कौन ? लंगडे मेरा हुस्न देखा है! बहुत है मुझे चाहने वाले तेरी देखभाल करू ! तेरी बीवी हूँ क्या और सून तेरे दोस्त को भी मैने ही यहाँ बुलाया था तू अपनी बीवी का नही हुआ मेरा क्या होगा तू तो उस शरीफ औरत को मनहूस का ताना देता रहा मनहूस वो नही तू है वह तो इतना बर्दाश्त कर रही है | तूने अपनी आग बाजार में बुझा ली कभी उसके बारे में सोचा वह भी तो शादीशुदा है अगर तेरी तरह वह भी ऐसा करती तो | तू अपनी बीवी का नही हुआ क्या क्या नही कहा कितना बडा झूठा है तू | अच्छा हुआ तेरे साथ यह हुआ मै तो बजारू हूँ बहुत मिल जायेगे लेकिन तेरी बीवी तो शरीफ है उसे तो खुश रख | अपने माँ बाप की भी नही सोची ...तेरे जैसे कितने... मेरे एक इशारे पर मर मिटे |"

पालुमी  के आँख से आँसु बह निकले अपना अपमान वह बर्दाश्त न कर सकी | वह  सन्जना के पास जाकर माफी मांगती है कहती है उसने उसे अच्छा सबक सिखा दिया है अब यह किसी और गैर औरत की ओर आँख उठा कर भी नही देखेगा और चली जाती है |

सन्जना रोती है उसे नवीन के लिए दुख होता है लेकिन चुपचाप रहती है बुखार से  उसका पूरा शरीर अकडा हुआ था  |

नवीन अपने  कमरे में बैठा हुआ सोचता है कि पालुमी ने उसकी आँख खोल दी पैसे देकर वह जिन खुशियों को खरीदता था वह तो अस्थायी  थी जब उसने  चाहा कि वह हमेशा के लिए मिल जाये पालुमी जो उसकी जान थी अपने साथ रख ले ऐसा हो नही पाया | उसे शिद्दत से सन्जना की याद आती है जिस पर इतने जुल्म करता था जब उसके साथ वही हुआ तो वह टूट गया वह समझ गया  जो सितम उसने सन्जना पर किये उसे कभी कोई खुशी न दी उसके बदले में उसे यह लाचारी भरी जिन्दगी मिली है उसकी आँख से आँसु बह निकलते है तभी गोपालदास और दीपाली वहाँ आते है और उससे कहते है , "अच्छा किया जो तूने उसे खुद ही भेज दिया |" माँ ...कहता हुआ नवीन माँ से लिपट जाता वह कहती  है , " बेटा तू अपने गुनाहों की माफी मांग ले सन्जना से तभी इस घर में खुशियां वापस आयेगी नही तो पूरे समाज में तो उनकी इज्जत जा ही चुकी है |"

माँ सन्जना को उसके पास भेजती है नवीन बिस्तर पर लाचारों की तरह लेटा हुआ आँसु बहा रहा था सन्जना को देखता है तो उसे अपने पास बुलाता है और उसे बैठाने को कहता है सन्जना उसे उठाती है उसका शरीर बुखार से  जल रहा था .... " तुम्हे तो बुखार है सन्जना !  "
सन्जना खामोश थी उसका दर्द आज नवीन को साफ दिख रहा था | आखिर क्यो वह भटका उसे खुद से ही घृणा हो रही थी जिसके साथ पवित्र अग्नि के फेरे ले अपना बना कर इस घर में लाया था ....फिर दूसरी औरत को देखा ही क्यूं |
सन्जना को इतने सालों के बाद पति की आँखों में प्यार दिख रहा था लेकिन वह बेहोश हो गयी !
सास ससुर व बच्चे भागते हुए आते है , तब तक देवेन भी वापस आ जाता है जो शहर से बाहर अपने दोस्त
के यहाँ था |

माँ सन्जना को दवा दी वह होश में आयी तो नवीन उसको ही देख रहा था उसके चेहरे पर नफरत की जगह प्यार था बच्चें उसके करीब आ गये मम्मा जब आप बेहोश हो गयी तो पापा ही आपकी देखभाल कर रहे थे अब वह आपसे गुस्सा नही है आप भी पापा से हाथ मिलाओं ... नवीन सन्जना से माफी मांगता है | सन्जना अपनी पलकें झुका लेती है वह खामोश थी किसी से कुछ नही कहती चुपचाप मंदिर चली जाती है सामने कान्हा जी की मूरत मुस्कुरा रही थी , वह पूछती  है आखिर क्यों ?   ...यह सब हुआ ..... उसे कोई जवाब नही मिलता सिर्फ हरे कृष्णा हरे रामा का उच्चारण  सुनाई दे रहा था चारों और असीम शान्ति थी |


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सुनीता शर्मा खत्री
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(चित्र गुगल से साभार)




















Friday, January 25, 2019

खुशी का अहसास

"तुम मेरे लिए खाना भी नही बना सकती .... मै रात दिन तुम्हारे लिए खटता हूं.".. आफिस से घर लौट कर आया राकेश गुस्से से आग बबूला हो रहा था... FOLLOW Sunita Sharma https://www.momspresso.com/parenting/httpchittachurchablogspotcom/article/khushi-ka-ahasasa

Sunday, January 6, 2019

भीगा मन

Momspresso Check out this interesting blog post "भीगा मन " by Sunita SharmaKhatri. Read Here: https://www.momspresso.com/parenting/httpchittachurchablogspotcom/article/bhiga-mana

भीगा मन

https://storymirror.com/read/story/hindi/ttprumya/bhiigaa-mn

Wednesday, July 25, 2018

पश्चाताप की ज्वाला  - 2
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…“ मम्मा पापा कब वापस आयेगे ...अपने खिलौने फैला रिन्कू ने माँ से पूछा, “  क्यो ? यह खिलौने क्यों फैलाये तुमने …”
जीया ने रिन्कू को डाँटा |

“इसमें एक भी बडी वाली गुडियाँ नही है मुझे भी बडी गुडिया चाहिए  | पापा को लैटर लिखों बोलो मेरे लिए बहुत बडी गुडिया लाये जिसे मै नहलाऊंगी  | जैसे मौसी नहलाती है अपने बेबी को मै बिलकुल वैसे ही नहलाऊंगी ,” रिन्कू ने अपनी रौ में जवाब दिया लेकिन माँ सोच में पड गयी  ! तो यह अपनी मौसी की देखा देखी नकल कर रही है मौसी का असर बच्चों पर पड रहा है | यह जीया से अनदेखा न हुआ वह समझ गयी | अब तो रिन्कू को समझा भी नही सकती क्योकि वह एक नम्बर की जिद्दी लड़की थी , छोटी थी इसलिए जीया ने फिर भी कोशिश की , “ अच्छे बच्चे जिद नही करते |”
रिन्कू चीखने लगी , “ मुझे बडी वाली डॉल चाहिए बस पापा को अभी लेटर लिखों मेरे लिए डॉल लेकर आये ”और नाराज़ हो मौसी के कमरे में चली गयी जीया उसको बुलाती रही वह नही आयी छोटे बच्चें के साथ खेलने लगी | जीया उसे कैसे समझा़ये कि  उसके पापा विदेश गये है | जहाँ से वापस आने में अभी बहुत समय बाकी है, जीया का मन वैसे भी नही लग रहा था वह पहली बार पति से दूर हुई है छोटी बहन को अब फुर्सत ही कहाँ है कि वह जो उसकी परवाह करे जबसे दीपक यहाँ रहने उसके तो रंग ढंग ही बदल गये माँ पिताजी भी उसी के रंग में रंगते जा रहे थे | क्यो न हो , था तो वह  छोटा दमाद ! अपनी कोई कसर न छोडता ससुर के इर्द गिर्द ही नाचता रहता जब से उसके पति व बडा दमाद काम के सिलसिले में विदेश चले गये रीया व माँ बडे खुश रहते नये दमाद दीपक की आवभगत में कोई कमी न रहती |
पिताजी ही हालचाल पूछते माँ को तो उसकी परवाह ही नही रही  बच्चे साथ थे फिर भी अकेलापन काटने को दौडता | नन्नू चिडचिडा हो रहा था , मौसा को देखता तो अपने पिता को और अधिक याद करता जबसे रीया व उसका पति यहाँ आकर रहने लगे थे  तब से जीया के बच्चे खुद को अकेला पाते लेकिन उनके नाना इस बात को भलि भाँति समझते थे , वह कोशिश करते दोनो बेटियों के परिवारों में तालमेल बैठाने की किन्तु बडे दामाद के बाहर जाने से बच्चों का मन  नही लगता ..वह कहते थोडे दिन की ही तो बात है जब उनका बडा दामाद वापस आ जायेगा तो पूरा परिवार भैरों बाबा पर माथा टिकाने जायेगा जिनकों वह बहुत मानते थे उन्ही की कृपा से दो नाती मिले …. अब तो नाना -नानी  बच्चों के साथ समय बिताते | कारोबार व बाहरी कामों की बागडोर दीपक के हाथों में आ चुकी थी |
अपने घर शहर वापस लौटने का वह नाम भी न  लेता उस पर रीया कहती फिरती….. “ जीजा जी के घर में न होने से उसके पति दीपक ने परिवार की जिम्मेदारी अच्छे से संभाल ली है |” माँ को कहती,  “ क्यो न उसे व दीपक को भी हमेशा के लिए यही रख लिया जाये जैसे दीदी-जीजाजी व उनके बच्चों को इसी घर में रखा हुआ है शादी के बाद से दीदी तो अपने ससुराल मेहमानों की तरह जाती है उल्टे वही लोग यहाँ आते है |”
जीया सारी बातें सुन के भी अनसुना करती रही यही सोच यह अभी समझदार नही है शायद रीया को याद नही  उसके शादी के बाद से ही पति को पिता ने दमाद नही बेटा बना कर अपने पास रखा था |
…….

जीया की तबियत बहुत खराब थी उस दिन , सभी उसके ईर्द गिर्द थे रीया भी बडी बहन की देखरेख में जुटी थी | रिन्कू भी अपनी माँ के पास थी माँ की आँखे खुल ही नही थी | डॉ0ने वी.पी लो बताया साथ ही बुखार से जीया का पूरा शरीर अकडा हुआ था बच्चे परेशान थे ...रिन्कू रोने लगी, “ अब कभी बडी वाली गुडिया नही माँगुगी  भैया पापा को कर लेटर लिख मम्मा की तबियत खराब उनसे कहना जल्द आ जाना चाहे गुडिया भी न लाना पर जल्द आना मै भी गुस्सा नही करूंगी |” मौसी समझाती है, “ तुम्हारी मम्मा ठीक हो जायेगी | ”

जीया की तबियत बिगड रही थी तो दीपक सलाह देता है मेरे शहर अच्छे व बडे बडे डॉ0 है दीदी को वही दिखला देते है यहाँ के डॉक्टरों के इलाज से कुछ फायदा नही हो रहा |
पिताजी मना करते है लेकिन माँ अनुमति दे देती है , जीया ,  रीया ,दीपक रिन्कू नन्नू व छोटा बच्चा सभी जीया के इलाज के लिए रवाना हो जाते है | पिताजी ने इसके लिए दीपक को बहुत बडी रकम दी ताकि जीया के इलाज में किसी तरह की रूकावट न आये |
रीया काफी दिनों बाद अपने ससुराल के घर में पंहुची रीया को सब समेटना पडा  | घर गन्दा था व बन्द था क्योकि वहाँ कोई न था सभी वहाँ से जा चुके थे रीया दीपक से पूछती है तुम्हारे भैया भाभी कहँ गये तो वह टाल देता है कहता वह नये मकान में शिफ्ट हो गये है |
अगले दिन दीपक जीया को एक प्राईवेट डॉ0 के पास ले जाता है |
वह जीया का मुआयना कर कहता है इन्हे कोई बीमारी नही है बस मानसिक तनाव है जिस वजह से इनकी यह हालत है इन्हे किसी भी तरह का तनाव न दे साथ ही वह कुछ दवायें भी लिखता है कहता यदि  आराम न हो तो वह दुबारा आ सकते है |
रीया अपनी बहन की पूरी देखभाल करती है वह थोडे ही समय में बिलकुल ठीक हो जाती है रीया अब दीपक का अहसान मानने लगी कि उसकी वजह से दीदी की तबियत ठीक हो गयी |

जीया की तबियत संभलनी लगी तो सभी घर वापस आ गये |
जिस व्यक्ति को कोई पंसद नही करते था वह एकदम से हीरो बन गया जीया के बच्चे भी मौसा मौसा करते उसके आगे पीछे घुमते परिवार में वह रोल मॉडल बन चुका था वजह जीया की इलाज उसने अच्छे से कराया , पिताजी भी उस पर निर्भर रहने लगे  नन्नू भी मौसा मौसा करता पिता के अभाव की पूर्ति कर रहा था | उसके इन सभी कोशिशों के पीछे कितना बडा फरेब था नियति देख रही थी..
बुढे  हो चले नाना को को उस पर इतबार करना ही होता लेकिन न जाने क्यों कुछ था जो उन्हे खटक रहा था | दीपक अब पूरी तरह परिवार का हिस्सा बन चुका था जीया के बच्चों को अपनी रिश्तेदारी में घुमाता जो नही करने चाहिए वही  जान बूझ कर गलत काम करना सिखाते बच्चों कों नन्नू गन्दी गन्दी किताबें पढता रिन्कू मौसी की तरह बनती जा रही थी |
जीया यह सब देख घुट रही थी लेकिन कमजोर शरीर और पति की अनुस्पथिति ने उसे तोड कर रख दिया अभी उसे वापस आने में समय था पत्र व फोन से वह सबके हाल चाल पूछते रहते |
वक्त अपनी रफ्तार से दौड रहा था दीपक नये शहर में खुद को अच्छे स्थापित कर चुका था अपना खुद का काम भी वही जमा लिया |  जब बडा दामाद विदेश से वापस घर पंहुच गया बच्चे बहुत खुश हुए जीया भी काफी खुश थी आखिर इतने दिनों के बाद उसका पति वापस आया , लेकिन रीया व दीपक के माथे के बल साफ नजर आ रहे थे जिसे पिताजी की बूढी अनुभवी ने साफ पहचान लि़या | वह बहुत खुश थे उनका दामाद या बेटा आ चुका था |
पापा मेरे लिए क्या लाये रिन्कू दौड कर पापा के गले लग गयी अभी बताता हूं सबने घेर लिया सबके चेहरे पर हंसी थी ….रीया अपने बच्चे के साथ एक कोने में खडी थी ...दीपक कही घुमने निकल गया पिताजी का चेहरा देखने लायक था इतने दिन उन्होने अपने प्रिय के अभाव में कैसे बिताये वही जानते थे वह प्रसन्न थे  “ अरे कालू कहां मर गया ” ! नौकर को आवाज लगाने लगे , … “ जा पूरे मौहल्ले में लड्डू बाँट आ मेरा बेटा घर आया है इतने दिनों बाद ”!

पापा ने नन्नू को अपने पास बुलाया  पछा , “ तुमने पढाई की न ढंग से ?” ‘  हां पापा ’ उसने सर झुका लिया !
“ रिन्कू यह लो तुम्हारी बडी वाली गुडिया !”

“ओह ! यह तो बहुत बडी है बिल्कुल मौसी के बेबी जैसी अब मै इसको रोज नहलाऊंगी” !
“नानी  , मौसी हंसने लगे फिर माँ जीया से जा लिपटी  “ मम्मा तुमने मेरे लिए गुडिया मंगवा दी पापा को लैटर में लिखा मेरी प्यारी मम्मा तुम बहुत अच्छी हो!”

फिर अपनी डॉल से खेलने लगी | “ अरे रीया तुम वहाँ क्यो खडी यहाँ आओ यह देखों मुन्ना के लिए  !” फिर उन्होने बहुत से कपडे खिलौने के पैकेट रीया को पकडा दिये | “ माँ , पिताजी यह तुम्हारे लिए !”, “ इसकी क्या जरूरत थी दामाद जी ”
“जो मुझे समझ आया,  मै ले आया समय का अभाव था ,
कुछ समय बाद फिर जाना होगा वहाँ एक ओर नया प्रोजेक्ट शुरू होगा |”
जीया की तरफ देखा फिर उसका हाथ पकड कमरे में ले गये “तुम्हारी तबियत ठीक है मै तुम्हे अपने साथ ले जाऊंगा अबकी बार ” , “ मै ठीक हूं ” जीया मुस्कुरा दी उस मुस्कान में दर्द था |

बडे दामाद के विदेश से वापस आने के बाद घर में उत्सव का माहौल था ...उनके बाहर जाते ही परिवार में बहुत बदलाव आ चुका था जिसे वह महसुस कर रहे थे |
रीया का बच्चा बोलना सीख रहा था बडे मौसा उसे बहुत प्यार करते समय मिलने पर उसके साथ खेलते व घुमाते वह उनका लाडला बन चुका था  , वही नन्नू उनका खुद का बेटा पढाई में निरन्तर पिछड रहा था छोटे मौसा-मौसी ने नन्नू और रिन्कू को अपने प्रभाव में लिया हुआ था दोनो बच्चे पिता के पास कम व छोटे मौसा के साथ अधिक समय बिताते  थे |
जीया छोटी बहन का पति होने के कारण कुछ कह न पाती उस पर मां को वही पंसद था ! मां के आस-पास रहने की कोशिश करता | सासुमां खुश रहती उससे जबकि ससुर को बडा दामाद ही प्रिय था उसके आने के बाद जब दोनो ने कामकाज की खबर ली तो उसकी कारगुजारियां सामने आयी | बाजार में अपना काम जमाने के लिए बहुत से लोगो से कर्ज लिया था जो लोग उनके विरूद्ध रहते थे | वह सब समझ रहे थे पर बेटी नाती और पत्नी ने बेबस बना दिया कि वह चाह के भी कुछ न कर पाते ...एक बार पत्नी को बताने की कोशिश की तो उसने बडे की तरफ जारी व छोटे को स्वीकार न करने का लांछन लगा दिया पति पर ! निपट गंवार स्त्री उसकी धूर्तता को भी नही देख पा रही थी बस अपनी छोटी बेटी-दामाद के प्यार में अंधी बनी रही |
जीया को कभी -कभी पश्चाताप होता कि  उसने छोटी बहन व उसके परिवार को अपने घर में रख कही गलत तो नही कर दिया |
रीया की आदत थी बात बात पर ताना देने की , “ दीदी बीमार हुई तो दीपक ने ही उनका इलाज करवाया जीजा जी तो विदेश में ऐश कर रहे  थे जबकि दुख तकलीफ दीपक ने बरदाश्त की ! ” उसकी यही बातें दीदी को चोट पंहुचाती न जाने रीया इतना कैसे बदल गयी वह अक्सर यही सोचती कि यही वह उनकी छोटी बहन है जिसकों उसके जीजा व उसने इतना प्यार दिया दीपक से शादी के बाद वह बिल्कुल ही बदल चुकी थी |
नन्नू रिन्कू मौसा मौसी के कहने में रहते तो तो दीदी जीजा अपना सारा प्यार रीया के छोटे बच्चे के ऊपर लुटाते रहे वक्त बीतता रहा |
अचानक जीया की तबियत बहुत  खराब हुई दोबारा तो दीपक व रीया ने उसी डॉ0के पास जाने को कहा जहाँ जीया का पहले इलाज हुआ था , जीया के पति रवीश नेे मना कर दिया  वह अब अपने आप ईलाज करवायेंगे | वह रीया के तानों को अपने कानों से सुन चुके थे |

रीया  और दीपक ने जब दीदी की तबियत खराब देखी तो पिता पर जोर डालने लगे की उसी डॉ0 को दिखायें जहाँ पहले इलाज से वह ठीक हो गयी थी | इस बात के लिए उन्होने माँ व पिताजी को अच्छी तरह समझा दिया वह भी राजी हो गये क्योकि पहले भी  जीया दीदी की तबियत सही हुई थी अब रवीश ने नयी बात की कि वह वहां न जाये इस बात के लिए कोई भी तैयार न हुआ | बीमार दीदी को भी दीपक व रीया के साथ वापस उसी शहर में जाना पडा रवीश की एक न चली ...वह मन मनोस कर घर पर वही रह गया उसे दीपक के हथकंडे अच्छी तरह समझ आते थे साथ ही उसकी चालाकियां भी और वह दिखावा भी जो वह दिखाता था कि उसे परिवार की कितनी परवाह है ...उन्होने दुनियां देखी थी लेकिन परिवार के आगे बेबस हो चले अपने गुस्से का इजहार उन्होने साथ न जाकर किया |
खाली घर में नौकर व पिताजी के साथ वह अकेले थे अबकी सासु मां भी उन सबके साथ थी उनका पुराना नौकर कालू रवीश के पास आकर बोला , “ बाबुजी आपकों जीया बिटियां के साथ जाना चाहिए था ”..
“ क्यों कालू ? सासु मां और बच्चे तो साथ गये है न ! ? ”
“ हाँ वह तो ठीक है पर जीया बिटियां बहुत ही बीमार रहती है | एक बार आप भी जाते तो डॉ0 से समझ लेते उ को कौन बीमारी है ? ”
तुम सही कह रहे हो कालू लेकिन मै दीपक की कही हुई जगह पर नही जाना चाहता  था | मैने जीया के लिए बहुत ही बडे डॉ0 से बात की थी लेकिन मेरी नही सुनी मेरी गैरहाजिर में
इसने जरा क्या ध्यान रखा खुद को बडा हीरों बन रहा है , जबरन मेरे परिवार का सदस्य बन बैठा | ”
“ जी बाऊ जी आप सही कहे रहे ई दीपक बाबू पता नही कहाँ घुमे रहे कौन कौन अजीब अजीब आदमी के मिले रहे है ई ई  की नीयत ठीक नही |”
“रवीश बेटा , ”  …
“ हाँ पिताजी …”  ससुर की पुकार सुन रवीश उनके पास चले गये | कालू ने अपना गमझा उठाया और घर की साफ-सफाई में जुट गया |

इस  बार जीया और सभी लोग घर वापस तो आ गये लेकिन जीया की तबियत में खास फर्क नही पडा , रवीश पहले ही नाराज थे पर पत्नी की हालत देख उन्होने कुछ नही कहा एक बात उन्हे दुख पहुंचा रही थी नन्नू व रिन्कू उनकी बात कम और मौसा की बात को ज्यादा मानने लगे  थे इस वजह से दीपक उनकी माजाक उडाता .. “ बडा काबिल बनता है बच्चे तो कहना नही मानते ”.. गुस्से में रवीश ने नन्नू पर सख्ती बरतने शुरू कर दी वह धीरे-धीरे बडा हो रहा था इन सभी कारणों से उसने घर में सभी लोगो से दूरी बनानी शुरू की और अपने दोस्त निशान्त के साथ समय बिताने लगा वह उसके साथ स्कूल में था , पढाई का बहाना बना नन्नू उसी के घर में ज्यादा समय बिताता |
जीया का बेटा उससे दूर हो रहा था वह और भी दुखी रहती रवीश ने अपनी फैक्ट्री के सभी विदेशी प्रोजेक्ट रद्द कर दिये उसका ध्यान जीया की तरफ लगा रहता  , वह चाहते थे कि जीया खुश रहे |
जीया और रवीश के घर फिर से नया मेहमान आने वाला था ….ऐसे कमजोर शरीर में प्रेगनेंसी...डॉ0 ने कहा कि वह चाहे तो इस बच्चे को गिरा सकती है क्योकि उनके पहले ही दो बच्चे है लेकिन जीया न मानी उसने कहा कि वह उसे जन्म देगी ….बच्चे अपनी दूनियां में मग्न रहते ! जीया के पास  काम से ही आते ..दीपक अपने रंग ढंग सबको देखा चुका था बडे दामाद को वह फूटी आँख न भाता लेकिन रीया व बच्चे की वजह से सभी उसे बरदाश्त करते | रीया ने उससे शादी कर पूरे परिवार को गहन पीडा में पहुंचा दिया था जिससे बाहर आना किसी के बसे में न रहा बस समय अपनी रफ्तार से भागा चला जा रहा था उस पर  किस का जोर चला है !
जीया ने अपने तीसरे बच्चे को जन्म दिया वह काफी मोटा व सुंदर था रिन्कू बहुत खुश थी ...उसे उसकी बहन मिल गयी |
नन्नू ने जब उस बच्ची को देखा तो माँ से गुस्सा हुआ कि उन्होने कभी नही बताया था पहले कि उसकी एक और बहन आने वाली है ...वह गुस्सा हो अपने दोस्त के घर चला गया | दोस्त की माँ ने उसे समझा बुझा कर घर वापस भेज दिया नन्नू ने खुशी खुशी अपनी नन्ही सी बहन को गोद में उठा लिया |
खुशी का माहौल था नानी व मौसी बात बनाने लगे जीया कि दो दो बेटी हो गयी इससे अच्छा तो एक लडका और हो जाता , रवीश उनसे नाराज हो गया और उसने अपनी बेटी को उन्हे छुने नही दिया वह जानते थे कि दीपक के रंग में सास और साली रंगे हुए है अब वह उनसे बात नही करते थे |
रवीश रात भर जग कर अपने छोटे से बच्चे की देखभाल करते ताकि पत्नी को तकलीफ न हो |
जैसे जैसे वक्त बीत रहा था घर  हालात सुधरने के बजाय
बिगडते ही गये नन्नू व रिन्कू अपनी बहन के साथ खेलते नये बच्चे के आने से पिता का ध्यान भी उसमें रहता इससे दीपक को काफी जलन होती उसका बच्चा पतला दुबला ही रहा जबकि जीया का बच्चा सुंदर व तंदुरूस्त रीया उसे देख जलने लगी उसे लगता दीदी ने दो बच्चों के बाद भी हमें जलाने के लिए डॉ0 के मना करने पर भी अपना एक और  बच्चा पैदा किया …! रीया व दीपक की जलन चरम सीमा पर जा पंहुची |
आये दिन दीपक रवीश से उलझने की कोशिश करता ...ससुर का पैसा बिजनेस करने के नाम पर डूबा दिया, बडे दामाद
रवीश से जलता व उसके बारे में झूठी बातें फैलाता घर का माहौल उसने बर्बाद कर दिया था ...यह सब देख पिता का ब्लडप्रेशर बढने लगा |
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 To be continue...
सुनीता शर्मा खत्री
© pic from goggle

Wednesday, June 27, 2018

पहली पत्नी

पहली पत्नी
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“ कैसी होगी वह सुंदर या मेरे जैसी साधारण निखिल बाबू को छोड क्यूं चली गयी सुना है जीवित है फिर उसने ऐसा काहे किया तुम्ही बताओं काहे चली गयी वो सुबह पौ फटने से पहले ही ..का खराबी रही ई ससुराल में कौनो कमी तो नाही ऐसा काहे किया ..तुम्ही बताओ ननदियां तोहार भैया को छोड काहे चली गयी ..अब कहाँ है ओ का कौन पता बताये दे तो पूछेगे ओ से काहे छोड दिया बाबू को तोको कितना चाहे रहे ...जबसे हमे ब्याहे के आये है एक भी दिन हमसे हंस के नाही बोले चौबीस घन्टा हमऊ में कमी नजर आती है ऊ का जब हम से प्रेम था ही नही तो काहे हमसे ब्याह कर लिए हमको यहां घुटन लगती है ऐसा लगता है हम किसी और का कछ् छीन लिए है नाही ननदियां अब नाही रह सकत|
 हम यहाँ , तुम हमही को घर, समाज ईज्जत की दुहाई देते हो, हमई को सब समझात हो , हमार मायके वाले भी उ की बात सुने है | ऐसे घर में नही रहना हमें जहां हमारी कोई इज़्ज़त नही तुम उसी को वापस ले आओ , तुहार भैया की खातिर ऊ की पहली पत्नी …. को हम कभी पहली नही बन सकते चाहे हम कितनी भी कोशिश कर ले |”

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चित्र गुगल से साभार
सुनीता शर्मा खत्री
©

Monday, May 28, 2018

फिल्म


फिल्म
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'क्या मस्त फिल्म थी रे ..बहुत मजा आया देख के ! तेरा मन नई करता ऐसा करने का...! ' "क्यों नही करता अभी कौन छोकरी देगा कोई काम धन्धा तो है नही फिल्म भी तेरे पैसे से देखी दोस्त हो तो तेरा जैसा ही ही ही .....!"
'अरे घनचक्कर चल कही हाथ साफ करते है बिलकुल फिल्म की माफिक ऐश करेगा अपुन दोनो बोल क्या करेगा ...क्यो नही दोस्त के लिए तो जान भी हाजिर तो फिर चल  कल दोपहर नयी बिल्डिंग के पास में आना , वहाँ काम चल रहा है '...नशा सर चढ बोल रहा था |
"हाय दैया!  हमार छोकरियां का क्या हाल कर डाले इसको सुला कर हम रेता ढोने गये रहे अब आकर देखा है मार डाला हाय करमजले कौन किये यह सब ..."! फर्श पर लहु फैला था |
'ई को अस्पताल ले चलों' ..."अब क्या ले जाऊंगा ई तो मर गयी है ..."
माँ दहाडे मार रो रही थी भीड में सबके आंसु निकल रहे थे |
अखबारों , टी.वी चैनल अपना रैग अलाप रहे थे ...पाँच साल की बच्ची के साथ रेप , दरिन्दों ने मासूम का मुंह बन्द कर गला घोंट के मार डाला |
बोतल एक तरफ लुढकी पढी थी ...दो नशेडी नशे में उन्नींदे बुदबुदा रहे थे ..."बिलकुल फिल्म की माफिक किया मजा आई गया |"
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सुनीता शर्मा खत्री
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Thursday, May 3, 2018

पश्चाताप की ज्वाला

पश्चाताप की ज्वाला 

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( कहानी , भाग-1)

‘ रीया रीया’ ...माँ ने पूरा घर छान लिया,  छोटी बेटी का कही अता-पता नही , कहाँ गयी है किसी को कुछ पता नही  माँ बडी बेटी के कमरे में आती है जो बच्चों को खाना खिला रही थी ..."जीया तुमने रीया को देखा कही गयी है  ? नही  क्या? तुम्हे बता के नही गयी  , नही माँ मुझे नही पता मै तो बच्चों के कामों में व्यस्त थी | आ जायेगी अपनी किसी सहेली के घर गयी होगी | तभी नन्नू भागा भागा गया बैठक से एक पत्र लेकर आया माँ को थमा दिया ,
"यह क्या है ? किसका खत है ,"
"मौसी ने दिया था सुबह और कहा था जब सब मेरे बारे में पूछेगे तब देना ".."अरी जल्द पढ जीया "...माँ के होश उड रहे थे , "क्या लिखा है इसमें !!"
जीया ने खत पढा और वही पडे सोफे पर निढाल हो गिर पडी | "क्या हुआ तू बताती क्यो नही माँ चीख रही थी माँ को ऐसे देख जीया ने बताया कि रीया ने दीपक से शादी कर ली है और वह उसके साथ उसके घर जा रही है तुम कभी उसकी शादी दीपक से नही करते इसलिए दोनों ने चुचचाप कोर्ट मैरिज कर ली है अगर वह उसको खुश देखना चाहते है तो कोई बवाल न करना  |
वह उसके साथ बहुत खुश है |" 

छोटी बहन घर से चली गयी अपने प्रेमी के साथ माँ ने अपने को बचाने के लिए  इल्जाम बडी बहन पर लगा दिया कि उसी ने उसे घर से भगा दिया ताकि पूरे घर में आराम से रह सके क्योकि वह पिता की लाडली थी और उनका कोई पुत्र भी न था जबकि बडी बहन अपने बच्चों में व छोटी बहन में भेद न करती थी जितना प्यार वह अपने बच्चों से करती थी उतना ही अपनी छोटी बहन से भी करती लेकिन छोटी बहन , बडी बहन की परवाह न कर मौज मस्ती में रहती उसने घर से जाने से पूर्व अपनी बहन-जीजा माँ व पिता के बारे एक पल भी न सोचा कि उसके इस तरह जाने से सब पर क्या फर्क पडेगा |
थोडे दिन  तक माँ रोती कलपती घुमती रही फिर चुप रहने लगी पिता की इज्जत पर जो बट्टा लगा उसकी वजह से उन्होने घर से निकलना छोड दिया , बडी बहन ने बिस्तर पकड लिया | इन सबसे परे छोटी बहन अपने प्रेमी के साथ ब्याह कर आराम से ससुराल में थी |
एक दिन रीया के पति को पता चलता है वह गर्भवती है तो तो वह उससे कहता  है कि अपने पिता को इसके बारे में बता दो |
"नही नही मै नही बता सकती वह मुझे कभी माफ न करेगे  हमने उन्हे बिना बतायें विवाह किया अब मेरा रिश्ता नाता सब उनसे टूट चुका , मेरे हर बंधन अापसे जुडा है "
"वह तुम्हारे पिता है जब उन्हे पता चलेगा कि तुम पेट से हो तो वह में स्वीकार कर लेगें , रीया चुप हो गयी और कुछ सोचने लगी जब हम घर में बिना बतायें विवाह कर रहे थे तब तो एक बार भी नही कहाँ कि अपने पिता को बता दो अब जब खुद के पिता बनने की बारी आयी तो कहते है अपने पिता को बता दो , क्या बताऊ क्या वह यह न कहेंगे कि मेरी अनुमति ले थी जब चुपके चुपके ब्याह किया तब क्यों न बताया |
उसको  यह लगने लगा कि दीपक अब बदल गया है बार बार मुझ पर घर में बात करने का दबाव बनाता है यदि ऐसा था तो घर से बिना बताये विवाह क्यों किया | ऐसे ही रीया सोचती रहती | बहुत सोचने के बाद उसने अपनी बडी बहन को पत्र लिखा अपना हाल चाल बताया व अपनी गल्ती के लिए माफी माँगी कि उन्होने किसी बिना बताये विवाह किया क्योकि वह जानती थी पिताजी दीपक से ब्याह के लिए कभी राजी न होंगे क्योकि वह उनकी नजरों बेकार व आवारा है जो सिर्फ दौलत के लिए उससे प्यार करता है जबकि दीपक ने कभी उससे ऐसी बात न की न ही कभी उसे पैसों के लिए तंग किया जबकि अपने ब्याह का सारा खर्च भी उसने खुद ही उठाया , वह अपने पति के साथ बहुत खुश है उसे उन सबकी बहुत याद आती है |
‎रीया ने पत्र में अपनी दीदी को कहा कि वह पिताजी से बात करे और उन दोनों को माफ कर दे क्योकि वह अब माँ बनने वाली है |
बडी बहन जब रीया का पत्र मिला तो वह बीमार थी बच्चों ने चुपके माँ को पत्र पढाया उसकी कुशलता के बारे में पता चलने पर वह खुश हो जाती है , छोटी बहन के माँ बनने की खबर दीदी के चेहरे को खुशियों से भर देते है वह माँ को बताती है कि वह परेशान न हो उनकी छोटी बेटी खुश है दीपक बहुत अच्छा है उसका बहुत ध्यान रखता है |
वक्त हर घाव को भर देता है  |  दीदी -जीजा  व माँ खुश लेकिन पिता ने इस बात को स्वीकार न किया कि छोटी बेटी ने घर में बिना बताये विवाह किया उन्होने रीया माफ न किया .......
दीदी ने रीया पत्र लिख अपनी कुशलता लिखी साथ उसे बधाई दी उन्होने कहा वह उससे नाराज नही है लेकिन वह एक बार अपने बारे में बता देती तो ज्यादा अच्छा रहता इस तरह घर से जा कर  बिना बताये शादी करना ठीक नही इससे सबका दिल टूटा है छोटी व लाडली होने के कारण पिताजी का अरमान था काफी धुमधाम से ब्याह करवाने का किन्तु अब क्या हो सकता है | रीया अपना ख्याल रखना  घर में माँ बच्चे तुम्हे बहुत याद करते है |
रीया को जब दीदी का पत्र मिली तो वह खुश हो गयी चलो घर में दाखिल होने का रास्ता तो मिला उसने दीपक को बताया वह मन ही मन मुस्कुरा उठा पर जाहिर न होने दिया |
जब रीया का बेटा हुआ तो उसने दीदी को दुबारा खत लिखा कि वह मौसी बन गयी है | दीदी को जह यह खबर मिली तो खुशी के मारे झुम उठी , बच्चे भी बहुत खुश हुए उनका भाई आया है | यह क्या!! नियति तो हंस रही धीरे धीरे , दीदी के ऊपर ....
रीया की बडी बहन जीया ने पूरे घर में लड्डू बाँटे , "मै मौसी बन गयी , मै मौसी बन गयी "......, रीया उनकी एकमात्र बहन थी , बच्चे छोटे थे दिल का  हाल उनसे कहती, " नन्नू , तू अब तू बडा भाई बन गया तेरा छोटा भाई आ चुका है , " पति उसे देख हंसता उसे बस इस बात की खुशी थी उसकी पत्नी जो इतने दिन से बिस्तर पकडे थे बहन की खुशी में उठ खडी हुई |
रीया के ससुराल वाले भी बहुत प्रसन्न हुए बहु ने पोता जो जना था वह था भी बहुत सुंदर माँ की तरह | दीपक ने रीया को अपनी बातों के जाल में फंसाना शुरू किया ..." मुझे लग रहा है यहाँ तुम्हारी ठीक से देखभाल हो रही रीया तुम्हारा फूल सा चेहरा मुरझा रहा है , यह मुन्ना भी बहुत कमजोर है |
तुम अपनी दीदी से कहो अपने पास बुला ले वहाँ तुम्हारी अच्छी देखभाल होगी नानी है , मौसी है वह अच्छे से तुम्हारा ध्यान रखेगे , यहाँ तुम दोनो को  कौन संभाले |"
रीया दीपक जैसे पति को पा निहाल थी उसे लगा उसे उसकी कितनी फ्रिक है , उसके फरेब को वह न पहचान पा रही थी |
रीया ने दीदी से पत्र में मिन्नत की कि वह उसे अपने पास बुला ले ससुराल में उसकी व मुन्ना की देखभाल करने के लिए कोई नही है दीपक सुबह ही काम के लिए निकल जाते है बाकी सदस्य भी नौकरी पेशा है , सभी सुबह से शाम तक घर  बाहर होते है जिससे अकेले छोटे बच्चे के साथ उसे बहुत सी परेशाानियां होती है | माँ जब मुन्ना को देखेगी तो उनकी नाराजगी भी दूर हो जायेगी पिताजी से बात कर लो उसे लेने आ जाये उसे माफ कर दे , हाँ और नन्नू को भी साथ लाना वह भी अपने छोटे भाई को देखेगा तो बहुत खुश होगा |
दीदी को जब पता चला कि उनकी बहन तकलीफ में है उनसे रहा न गया उन्होने पिताजी को कहा कि रीया को यहाँ घर ले आवे पिताजी ने साफ मना किया जो मेरी इज्जत की परवाह किये बगैर घर से भाग कर शादी की है ऐसी लडकी की वह शक्ल भी देखना पसन्द नही करते लाना तो बहुत दूर की बात है |
दीदी ने भी जिद पकड ली खाना पीना छोड दिया अगर रीया को यहाँ नही लाओगे तो वह अन्न को हाथ भी न लगायेगी | छोटी बहन की तकलीफ ने उन्हे विचलित बना दिया,  पता नही कैसी होगी ?  कौन देखभाल करता होगा? मुन्ना को कौन संभालेगा ? बस उन्हे यही धुन सवार थी कैसे भी हो रीया को यही लाना है | पिताजी बेबस हो गये अब , मन मार के उन्होने रीया को घर लाने तैयारी शुरू कर दी |
दीदी काफी उत्साहित थी साथ ही बच्चे भी धमाचौकडी मचाये थे , एक नन्हा बच्चा उनकी मंडली में शामिल होने वाला था  |अब पूरे भाई -बहनों की संख्या तीन हो गयी | नन्नू बहुत खुश था सोचती कैसा होगा मेरा भाई | वह भी अपने नाना जी के साथ मौसी को लेने चल पडा |
नन्नू  ने जिद की कि वहअपने छोटे भाई के लिए खिलौने भी लेकर जायेगा सबने मना किया वह न माना अपने खिलौनों में से कुछ छोटे छोटे हाथी , घोडे और बॉल अपने बैग में रख लिए , वह पहली बार ट्रेन से जा रहा था पूरे घर में दौडता फिरता , "हम ट्रेन से जायेगे ! '  ट्रेन चली छुक छुक'.... गाना गाता , खुश होता !!
जब पिताजी व नन्नू रीया के घर पंहुचे तो वहाँ कोई न था रीया छोटे बच्चे के साथ अकेले थी उसका चेहरा मुरझा चुका था बच्चा भी बहुत कमजोर था | पिता ने जब यह देखा तो उनकी आँखे भर आयी रीया को वह इस हाल में देखेगे उन्होने कभी सोचा भी न था उन्हे गुस्सा भी बहुत था प्यार में अंधी ने ऐसा क्या देखा जो पिता की परवाह भी न की किन्तु जीया की खातिर उन्होने खुद को संभाल लिया  जीया ने घर से चलते समय उनसे कसम ली थी वहाँ जाकर गुस्सा न करना नही तो उसका अनशन न टूटेगा  | दोनो बेटियों में जमीन आसमान का अंतर था पिता इस बात को समझते थे |
रीया पिताजी व भांजे को देख खुश हो गयी जैसे जलते हुए रेगिस्तान में पानी का मश्क मिल गया हो | नन्नू ने छोटे बच्चे को देखा देखता रहा उसका सफेद चेहरा बडी बडी आँखे बिल्कुल मौसी की तरह लगता था मौसी मौसी करता नन्नू मौसी के गले लग गया | मौसी ने उसे अपने बेबी को दिखाया और कहाँ , "वह चाहे तो उसे गोद में ले सकता है" नन्नू ने उले गोद में उठा लिया वह रूई के फाहे के समान हल्की था अपनी बडी आँखों से वो बच्चा भी नन्नू को देखने लगा कहता हुआ मानो !
'कैसे हो बडे भैया ?'
मासूम नन्नू ने अपने खिलौने उसे दिखाये यह क्या वह जोर जोर से रोने लगा मौसी ने उसे अपने सीने से लगा लिया मेरा बच्चा !!
नन्नू चुपचाप देखता रहा उसे अजीब लग रहा था मौसी को मानों उसकी कुछ फिक्र ही नही थी उसे भुख लग रही थी उसे अहसास हुआ वह यहाँ बेकार ही आया | नाना ने इस बात को भांप लिया और उसे ले बाजार आ गये वहां उन्होने नन्नू को खाना खिलाया व खुद भी खाया | वही से छोटे बच्चे के लिए कपडे लिए फल मिठाई भी ली शाम हो चली थी वह वापस मौसी के घर पहुंचे दीपक भी तब तक घर आ चुका था उसने बढकर ससुर जी के पांव छुये |
उनके सख्त चेहरे को देख वह कुछ भी नही बोल सका अजीब सी खामोशी थी |
नन्नू और पिताजी रीया को लेकर अगले दिन वापस घर पंहुचे | रीया के छोटे से घर में एक रात बमुश्किल से काटी उसका बच्चा रात भर रोता रहा कोई ढंग से नही सो पाया | दीदी ने जब रीया को इतने समय के बाद देखा तो वह खुश हो गयाी लपक कर उसके बच्चे को गोद में ले लिया |
" ‎अरे!! यह तो बिल्कुल तुम्हारी तरह लगता है रीया तुम भी बचपन में ऐसी ही थी , माँ को दिखाते हुए बोली !  है न रीया जैसा " !
माँ को कुछ होश न था इतने दिन छोटी बेटी के वियोग ने उन्हे बावरा बना दिया था अब जब वह सामने थी तो उनके आँसु थमने के नाम न लेते थे |
"‎मेरी बेटी तू कहाँ चली गयी थी ," रीया भी माँ को देख रोने लगी दोनो माँ बेटी का मिलन हो रहा था उधर जीया उसके बच्चे को ले सारे घर में घुम रही थी पति भी खुश थे आखिरकार इतने दिनों के बाद घर में खुशी आयी वह रीया को अपनी साली कम बेटी अधिक मानते थे |
‎सबको खुश देख पिताजी ने चैन की सांस ली |
‎रीया के तबियत मायके आकर ठीक हो गयी यहाँ अच्छे से देखभाल जो हो रही थी बडे अमीर  बाप के घर में अभाव न था | वह खोयी खोयी रहती शायद उसे दीपक की याद सताती थी उस समय मोबाईल फोन  प्रचलन में नही थे , लैन्डलाईन फोन ही थे | कभी कभी दीपक से फोन पर बातें होती और उसके करीबी रिश्तेदार उस शहर में मौजूद थे जो दीपक के कहने पर वहाँ आने लगे घन्टों रीया से बातें करते माँ घर के कामों में , दीदी बच्चों में व्यस्त रहती अकेली रीया उनसे घुलने मिलने लगी |
‎धीरे -धीरे रीया ने अपनी जगह पिताजी की नजरों में बनानी शुरू की वह उनका पूरा ख्याल रखने लगी शायद उसके ऐसा करने से पिता का रूख उसकी ओर नरम हो उनकी नाराजगी दूर इसका वह जी जान से प्रयत्न करती उसकी कोशिशें रंग लाने लगी बुढा बाप,  बेटी व नन्हे नाती  के मोह में फंसता गया लेकिन नन्नू के प्रति उनके अनुराग में कमी न आयी वही उनका पहला नाती था | दो बेटि़यों के बाद जो पुत्र समान नाती उन्हे मिला था उसने पुत्र न होने के अभाव को खत्म किया था इसीलिए वह जहाँ भी जाते नन्नू सदैव उनके साथ होता था | रीया की कोशिशे होती नन्नू को उनसे दूर करने व अपने मुन्ना को उनके करीब करने की |
‎इन बातों से बेखबर जीया छोटी बहन को खुश जान , प्रसन्न रहती माँ तो अपना दुख भुल गयी और बहुत खुश रहती उन्हे एक नाती और मिल गया था इन सबमें लाडली बहन थी रिन्कू |
.....
दोनो बच्चे अपने बीच एक नन्हे बच्चे को देख बहुत खुश रहने लगे , नन्नू व रिन्कू दौड दौड कर मुन्ना के लिए चीजे लाते अपने खिलौने कपडे व दूसरा जरूरी समान सब अलमारी ले  बाहर निकाल ले आये  | रिन्कू जिद करती , " मुन्ना मेरे कपडे पहनेगा तो नन्नू कहता वो लडकी नही है लडका है बेवकूफ ! उदास रिन्कू मौसी से कहती कि वह लडकी क्यों नही लायी ", मौसी हँसती बच्चों की बातें सुन तब नानी बोली , "अगली बार रीया  उसके लिए बहन लायेगी" ...नानी की बात रिन्कू ने मान और माँ को बताने लगी , "माँ जब मौसी मेरे लिए बहन लायेगी तो मै अपने फ्रॉक उसको दे दूंगी |"
बच्चों के प्रेम को देख नाना-नानी व दीदी-जीजाजी हंसने लगे पर रीया अपने में खोयी रही दीदी ने उसकी उदासी को भांप लिया और दीपक को फोन किया कि वह भी यही आ जाये | दीपक को तो मानों मनचाहा वरदान मिल गया अगले ही दिन वह वहाँ आ धमका उसको आया देख पिताजी नाराज हुए लेकिन दीदी ने उन्हे समझा दिया कि माँ -बेटे उसे मिस करते है कुछ समय बाद तो वह रीया को अपने साथ ले ही जायेगा |
रीया बहुत खुश रहने लगी अब उसी घर में सब लोग थे माँ -पिता , दीदी-जीजा | घर में कोई कमी तो थी नही , बडा दमाद बहुत काबिल व अच्छी नौकरी में था विदेश से बुलावा आया काम के सिलसिलें तो वह मना नही कर पाये , इधर छोटा दमाद पंहुचा उधर बडा दमाद विदेश जाने की तैयारियों में  जुट  गया,  दीदी उदास दिख रही थी तो पति ने समझाया अब तो तुम्हारी बहन भी वापस यही आ गयी है कुछ समय की बात है | उन्हे बाहर जाना ही होगा |
To be continue....


सुनीता शर्मा खत्री

© 
कहानी का अंतिम भाग बहुत शीघ्र |

आखिर क्यों ??

****************** " क्या माँगती हो भगवान से पूजा पाठ कर ! " पूजा गृह से वापस लौटी सन्जना पर तंज कसता हुआ नवीन मुँह टेढा कर मुस...

life's stories