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खुशी

खुशी

*******(लघुकथा)  
"तुम मेरे लिए खाना भी नही बना सकती मै रात दिन तुम्हारे
लिए खटता हूं."..  आफिस से घर लौट कर आया राकेश  गुस्से से आग बबूला हो रहा था रात के दस बजे थे अभी तक डिनर नही बना था निशा अपना दर्द छिपा चुपचाप पति के ताने सुनती रही ," वहाँ क्यों खडी हो  बताओ मुझे दिन भर क्या करती रहती हो मोबाइल चलाने से फुर्सुत मिले ...यह हाथ क्यो छिपा रखा है |"
राकेश ने निशा की ओर देखा उसकी आँखों में आँसू थे | राकेश थोडा नरम पड चुका था क्या हुआ अब यह क्या नौटंकी है !! "अरे दिखाओं हाथ क्यों छिपा रखा है " | निशा ऐसे ही खडी रही राकेश ने उसका हाथ पकडा दुपट्टे से बावहर निकाला पूरा हाथ जला हुआ था जिसे छिपाने की कोशिश वो कर रही थी |" यह क्या हुआ? हाथ कैसे जला लिया और चुप क्यो थी बताया क्यों नही ? " "आपने बोलने दिया आते ही शुरू हो गये | " "सॉरी ..ये कब हुआ जब मै खाना बनाने के लिए गयी तो जल्दबाजी में कडाही मेरे  हाथ से छुट गयी और गर्म तेल गिर गया इसलिए डिनर नही बना पायी |"
राकेश ने बरनोल लगाया निशा के हाथ पर अब तुम बाकी के काम कैसे करोगी,…

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