तुम मेरे हों .....२

......विवेक के जाने के बाद मै भी ऑफिस के लिए निकल पड़ी ..धुप लुकाछिपी का खेल खेल रही थी फिर से बारिश होने लगी ...घर से ऑफिस बहुत दूर था . ख्याल फिर से मेरा पीछा करने लगा मौसम बहुत प्यारा हों गया था बारिश तो मुझे बहुत प्यारी लगती है मौसम मुझे पागल बना रहा था उस पर तुम्हारे यादे.....ऑफिस जाने का मन नहीं हों रहा था ड्राईवर को वापस भेज दिया खुद ही ड्राइव करने का मन हों चला था . उन पलों को जो सहेजना था जो तुम्हारे साथ बिताये थे ....यही वो पल है जिनके सहारे मै जी रही हू यही तो जीने के एनर्जी दिए रहते है . पहाड़ी रास्तो पर गाडी चलाना खतरों से खाली नही होता पर खतरों से डर कब लगता है .
कई बार लोगो ने मेरी आजादी को कैद करने के कोशिश की पर कामयाब न  हों पाए जब कैद होना चाहा था तो ऐसा तूफान आया की मेरे अस्तिव के 


चिंदे चिंदे ही उड़ गए . तब से यह अपने साथ ऐसा भवर साथ लिए चलती है की कोई आ रहा है या नहीं वह नहीं देखना चाहती है . 
.....बारिश की बूंदों ने मझे सरोबार कर दिया कैसी सिहरन से होती है मन तड़पता है मै और भी पागल होती जाती हू .तुम क्यों दूर चले गए प्रशांत !
इन रास्तो में अब भी अतीत को खोजती हू न  जीती हू न मरती हू ...सपना कितना अजीब था जो रात को देखा था वह अब भी मेरे साथ है लगा खुली आँखों से एक खवाब देख रही हू .मन सिसकता है तब सिर्फ तुम याद आते हों जो दुनिया समझती है सच नहीं है क्या मै तनहा हू नहीं मेरे साथ तुम्हारी याद जो है इन्ही के सहारे चलना है कितनी दूर तक पता नहीं ....!
कागज पर कुछ लकीरों को बनाया बिगाड़ा वही मेरी तक़दीर बन गयी इन आड़ी तिरछी ,काली सफ़ेद  लकीरो के माया जाल में ही उलझी हू अभी तक निकल नहीं पाई .गाड़ी चलाते चलाते थकान होने लगी खयालो से बाते करते करते कितनी दूर आ गयी .थोड़ी देर रुकने का मन हुआ ....हा यही तो हम बात किया करते थे घाटी बहुत दूर रह गयी ठंडी हवा चल रही थी ...कर सड़क के किनारे पार्क कर ...पहाड़ी से नीचे देखा
 खाई देख सिहरन होने लगी ...यह सुंदर जगह तुमने ही दिखाइ थी ओह माय गॉड...इट्स बयूतिफुल ....और तुम लगभग गिरते गिरते बचे थे तुम्हारी शरारते कभी ख़त्म न  होने  का नाम ही नहीं लेती थी .............to be continue...next part very soon .
(pictures frm google)

Comments

  1. कैसा लगता हैं मानों कहानी प्लॉट नहीं की वरन् किसी की अंतर्मन की कशिश टपक रहीं हो!!!
    भावनाओं का अंतर्द्वंद मन को खंगालता रहता हैं, ....तो लगता हैं इस कगार पर किश्तें क्यूँ एक बैठक में क्यूँ नहीं कहती पुरी कहानी......

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  2. कैसा लगता हैं मानों कहानी प्लॉट नहीं की वरन् किसी की अंतर्मन की कशिश टपक रहीं हो!!!
    भावनाओं का अंतर्द्वंद मन को खंगालता रहता हैं, ....तो लगता हैं इस कगार पर किश्तें क्यूँ एक बैठक में क्यूँ नहीं कहती पुरी कहानी......

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